वेदों में परमात्मा और जगत् का स्वरूप
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वेदों में परमात्मा और जगत् का स्वरूप

आचार्य विजय आर्य

Nov 5, 2025

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यस्य भूमिः प्रमान्तरिक्षमुतोदरम्। दिवं यश्चक्रे मूर्द्धानं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः॥ - अथर्ववेद १०.७.३२

- (यस्य भूमिः) जिस ईश्वर की भूमि वा पृथ्वी रूपी रचना (प्रमा) पाद वा चरण संज्ञा है अर्थात् जैसे पाद-चरण शरीर का भार वहन करते हैं, वैसे ही पृथ्वी पाद वा चरण सदृश अपने ऊपर रहने वाले प्राणियों का भार वाहन करती है। इसके अतिरिक्त जैसे शरीर में पाद वा चरण का स्थान नीचे होता है, वैसे ईश्वर रचित सृष्टि में पृथिवी नीचे होने से पादस्थानी वा पादतुल्य है। (उत अन्तरिक्षम् उदरम्) और अन्तरिक्ष रूपी रचना उदर संज्ञा है अर्थात् जैसे उदर शरीर के मध्य भाग में होता है, ऐसे ही ईश्वर की सृष्टि में जो पृथिवी और सूर्य के बीच में अन्तरिक्ष-आकाश है, सो उदरस्थानी है, (यः दिवं मूर्धानम् चक्रे ) और जिसने [सृष्टि रचना के समय] दिव अर्थात् प्रकाश करने वाले तारों आदि पदार्थों को मूर्धा-स्थान को किया अर्थात् ऊपर मस्तक-स्थानीय बनाया, (तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः) उस परब्रह्म को हमारा अत्यन्त नमस्कार हो॥

यस्य सूर्यश्चक्षुश्चन्द्रमाश्च पुनर्णवः। अग्निं यश्चक्र आस्यं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः॥ - अथर्ववेद १०.७.३३

- (यस्य सूर्यश्चक्षुश्चन्द्रमाश्च पुनर्णवः) और जिस ईश्वर की सूर्य और चन्द्रमा रूपी रचना चक्षु संज्ञा है, उन्हें ईश्वर ने सृष्टि में चक्षुवत् नेत्रस्थानीय किया है। जो कल्प कल्प के आदि में सूर्य और चन्द्रमादि पदार्थों को वारम्वार नवीन रचता है, (अग्निं यश्चक्र आस्यम्) और जिसने मुख वा मुख्य स्थानी अग्नि को उत्पन्न किया है, (तस्मै॰) उसी ब्रह्म को हम लोगों का नमस्कार हो॥

यस्य वातः प्राणापानौ चक्षुरङ्गिरसोऽभवन्। दिशो यश्चक्रे प्रज्ञानीस्तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः॥ - अथर्ववेद १०.७.३४

- (यस्य वातः प्राणापानौ) जिसने ब्रह्माण्ड के वायु को प्राण और अपान की तरह किया है, (चक्षुरङ्गिरसोऽभवन्) तथा जो प्रकाश करने वाली किरण हैं, वे चक्षु की तरह जिसने की हैं, अर्थात् उनसे ही रूप ग्रहण होता है। (दिशो यश्चक्रे प्रज्ञानीस्त॰) और जिसने दश दिशाओं को सब व्यवहारों को सिद्ध करने वाली बनाईं हैं, ऐसा जो अनन्तविद्यायुक्त परमात्मा सब मनुष्यों का इष्टदेव है, उस ब्रह्म को निरन्तर हमारा नमस्कार हो।

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं सर्वत स्पृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥ - यजुर्वेद ३१.१

पदार्थभाषाः - हे मनुष्यो! (सहस्रशीर्षा) सब प्राणियों के हजारों शिर (सहस्राक्षः) हजारों नेत्र और (सहस्रपात्) असङ्ख्य पाद जिसके बीच में हैं, ऐसा (पुरुषः) सर्वत्र परिपूर्ण व्यापक जगदीश्वर है। (सः सर्वतः) वह सब देशों से (भूमिम् स्पृत्वा) भूगोल को सब ओर से व्याप्त होकर (दशाङ्गुलम्) पाँच स्थूलभूत, पाँच सूक्ष्मभूत ये दश जिसके अवयव हैं, उस सब जगत् को (अति, अतिष्ठत्) उल्लङ्घन कर स्थित होता अर्थात् सब से पृथक् भी स्थिर होता है॥१॥

भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! जिस पूर्ण परमात्मा में हम मनुष्य और जगत् आदि के असंख्य शिर, आँखें और पग आदि अवयव हैं, जो भूमि आदि से उपलक्षित हुए पाँच स्थूल और पाँच सूक्ष्म भूतों से युक्त जगत् को अपनी सत्ता से पूर्ण कर जहाँ जगत् नहीं, वहाँ भी पूर्ण हो रहा है, उस सब जगत् के बनानेवाले परिपूर्ण सच्चिदानन्दस्वरूप नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव परमेश्वर को छोड़ के अन्य की उपासना तुम कभी न करो, किन्तु उस ईश्वर की उपासना से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करो ॥१ ॥

इस मंत्र में परमात्मा को 'सहस्रशीर्ष,' 'सहस्राक्ष' और 'सहस्रपात्' अर्थात् हज़ारों शिर, हज़ारों आँख और हज़ारों पैरवाला अलंकार-रूप से वर्णन किया गया है। सायण, महीधर, उदयन सभी भाष्यकारों ने इस मंत्र का वही अर्थ किया है, जो यहाँ ऊपर दिया गया है। सब प्राणियों के शिर, आँख, पग आदि उसी परमात्मा के अंदर विद्यमान हैं, इसी से उसे हज़ारों शिर, आँखों और पैरोंवाला कहा है।

पौराणिक भाष्यकार उव्वट-महीधर, करपात्री आदि ने भी इन मंत्रों के इसी प्रकार के अर्थ किये हैं।

दूसरा ऋग्वेद का मंत्र ईश्वरीय शक्तियों का ऐसी ही अलंकृत भाषा में निम्न प्रकार से वर्णन करता है -

विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्। स बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव एकः॥ - ऋग्वेद १०.८१.३

पदार्थान्वयभाषाः - (विश्वतः-चक्षु) सर्वत्र व्याप्त नेत्र शक्तिवाला वा सर्वद्रष्टा (उत) और (विश्वतः-मुखः) सर्वत्र व्याप्त मुख शक्तिवाला अर्थात् सब पदार्थों के ज्ञानकथन की शक्तिवाला वा सर्ववक्ता (विश्वतः-बाहुः) सर्वत्र व्याप्त भुज शक्तिवाला अर्थात् सर्वत्र पराक्रमी वा सर्वशक्तिमान् (उत) और (विश्वतः-पात्) सर्वत्र व्याप्त शक्तिवाला अर्थात् विभु गतिमान् (एकः-देव) एक ही वह शासक परमात्मा (पतत्रैः) प्रकृति के परमाणुओं द्वारा (द्यावाभूमी जनयन्) द्युलोक पृथिवीलोक-समस्त जगत् को उत्पन्न करता हुआ (बाहुभ्याम्) भुजाओं से-बल पराक्रमों से (संधमति) सम्पूर्ण जगत् को चलाता है ॥३॥

भावार्थभाषाः - जितनी भी मनुष्य के अन्दर अङ्गों की शक्तियाँ होती हैं, वे एकदेशी हैं, परन्तु परमात्मा की दर्शनशक्ति, वक्तृशक्ति, भुजशक्ति, पादशक्ति ये व्यापक हैं, इसी से वह द्यावापृथिवीमय ब्रह्माण्ड को कारण प्रकृति के परमाणुओं से उत्पन्न करके स्वाधीन करता हुआ यथायोग्य व्यापार करता है ॥३॥

महीधर ने भी आँख, मुख, बाहु, पाँव आदि से उन-उन शक्तियों का ग्रहण किया है, साकार इन्द्रियों का नहीं।

पौराणिक भाष्यकार उव्वट-महीधर, करपात्री आदि ने भी इस मंत्र के इसी प्रकार का अर्थ किया है।

उदयनाचार्य ने भी 'न्याय कुसुमांजलि' में इसके ऐसे ही अर्थ किए हैं। 'विश्वतश्चक्षु' का अर्थ सर्वज्ञ, 'विश्वतोमुख' का सर्ववक्ता, विश्वतोबाहु का सर्वसहकारिता, 'विश्वतस्पात्' का व्यापकता इत्यादि किया है।

यस्तिष्ठ॑ति॒ चर॑ति॒ यश्च॑ वञ्चति॒ यो नि॒लायं॒ चर॑ति॒ यः प्र॒तङ्क॑म्। द्वौ सं॑नि॒षद्य॒ यन्म॒न्त्रये॑ते॒ राजा॒ तद्वे॑द॒ वरु॑णस्तृ॒तीयः॑॥ - अथर्ववेद ४.१६.२

पदार्थान्वयभाषाः - (यः तिष्ठति चरति) जो पुरुष बैठा-खड़ा है वा चलता है, (यः च वञ्चति) और जो पुरुष ठगी करता है, और (यः निलायं चरति) जो छिप-छिपकर चलता है, षड्यन्त्रादि करता है और (यः प्रतङ्कम् [चरति]) जो भय का संचार करता है और (द्वौ संनिषद्य) दो जने एक साथ बैठकर (यत् मन्त्रयेते) जो कुछ मन्त्रणा, गुप्त विचार करते हैं, (तृतीयः राजा) तीसरा राजा (वरुणः) वरणीय वा दुष्टनिवारण वरुण परमेश्वर (तत् वेद) उसे जानता है ॥२॥

भावार्थभाषाः - परमेश्वर प्राणियों के गुप्त से गुप्त कर्मों को सर्वथा जानता और उनका यथावत् फल देता है ॥२॥

उपनिषद और गीता में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ईश्वर हाथ, पैर आदि इन्द्रियों से रहित है, परंतु उसमें सब इन्द्रियों की शक्ति विद्यमान है। देखो नीचे प्रमाण -

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं सुहृत्॥ - श्वेताश्वतर उपनिषद ३.१७

अर्थ - वह समस्त इन्द्रियों से रहित होकर भी समस्त इन्द्रियों के कार्यव्यापारों को स्वसामर्थ्य और स्वशक्ति से ही करने वाला है। सबका स्वामी-नियन्ता और सबका बृहद् आश्रय है।

उपनिषद् के एक अन्य श्लोक में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ईश्वर बिना हाथ, पैर, नेत्र इत्यादि इन्द्रियों के कार्य करने में समर्थ है -

अपाणिपादो जवनो ग्रहीता, पश्यत्यचक्षुः, स शृणोत्यकर्णः। स वेत्ति वेद्यं, न च तस्यास्ति वेत्ता, तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्॥ - श्वेताश्वतरोपनिषद् - ३/१९

- (सः अपाणिपादः) वह परमात्मा हाथ-पैरों से रहित होकर भी (ग्रहीता) समस्त वस्तुओं को ग्रहण करनेवाला तथा (जवनः) वेगपूर्वक सर्वत्र गमन/कर्म करनेवाला है, (अचक्षुः पश्यति) आँखों के बिना ही वह सब कुछ देखता है, और (अकर्णः शृणोति) कानों के बिना ही सब कुछ सुनता है, (सः वेद्यम्) वह जो कुछ भी जानने में आने वाली वस्तुएँ हैं, उन सबको (वेत्ति) जानता है, (च) परंतु (तस्य वेत्ता न अस्ति) उसका सम्पूर्णया जाननेवाला कोई नहीं है, ज्ञानी पुरुष (तम्) उसे (महान्तम्) महान् (अग्र्यम् पुरुषम् आहुः) आदि वा श्रेष्ठ पुरुष कहते हैं ॥ १९ ॥

भावार्थ - वह बिना हाथ के भी सबका ग्रहण करने वाला, पैर से रहित होकर भी वेगवाला है। आँखों से रहित होकर भी देखता है, और कानों से रहित होकर भी सुनता है। वह प्रत्येक जानने योग्य वस्तु को जानता है, परंतु उसका अंत जानने वाला अन्य कोई नहीं है। उसे ज्ञानीजन महान्, श्रेष्ठ आदि कहते हैं॥

इस लेख की रचना में महर्षि दयानंद रचित ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका और अन्य आर्य विद्वानों के लेखों से सहायता ली गई है।

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