उपनिषदों में क्षत्रिय राजाओं द्वारा ऋषियों/ब्राह्मणों को ब्रह्मविद्या का उपदेश - भाग २
प्रश्न - क्या ब्राह्मणों को ही अध्यात्म-संबंधी कथा करने अथवा शिक्षा देने का अधिकार है, अन्य वर्णस्थ व्यक्ति को नहीं
उत्तर - मुख्य रूप से कर्मणा ब्राह्मण को ही इसका अधिकार है, परन्तु आवश्यकता पड़ने पर अन्य वर्णस्थ व्यक्ति ब्राह्मण वर्ण के गुण होने पर शिक्षा दे सकता है अथवा जन्म से किसी अन्य वर्ण का व्यक्ति, ब्राह्मण की योग्यता प्राप्त करके, वैसा कर सकता है। केवल उपनिषद् में ही नहीं, परंतु अन्य महाभारत आदि ग्रन्थों में भी इसके प्रमाण हैं कि किसी एक वर्ण के व्यक्ति ने दूसरे वर्ण का कार्य किया, जैसे द्रोणाचार्य और कृपाचार्य ने ब्राह्मण होते हुए भी महाभारत युद्ध में क्षत्रिय का कार्य किया, श्रीकृष्ण ने क्षत्रिय होकर भी अर्जुन को गीता जैसा अध्यात्म-संबंधी उपदेश दिया। परशुराम ब्राह्मण थे, परंतु फिर भी युद्ध में कुशल थे। आज भी ब्राह्मण वर्ण के सभी लोग क्या ब्राह्मण का ही कार्य कर रहे हैं? नहीं!, इसलिए किसी कार्य पर जन्मना एकाधिकार की बात करना अनुचित है, सब कार्याधिकार कर्मणा अथवा गुण, कर्म और स्वभाव की योग्यता के अनुसार होने चाहियें। नीचे उपनिषद् से क्षत्रिय राजा अश्वपति का उदाहरण देखिये, जिसमें वह ब्राह्मणों को शिक्षा दे रहे हैं -
राजा अश्वपति द्वारा छह ब्राह्मणों को वैश्वानर आत्मा का उपदेश - छान्दोग्योपनिषद् ५ । ११-२४
एक समय की बात है, बड़े सम्पन्न परिवारों के पाँच ब्राह्मण वा विद्वान् परस्पर ज्ञान-चर्चा के लिए एकत्र हुए। उनमें प्रथम था - उपमन्यु का पुत्र प्राचीनशाल, दूसरा पुलुषि का पुत्र सत्ययज्ञ, तीसरा भाल्लवी का पुत्र इन्द्रद्युम्न, चौथा शर्कराक्ष का पुत्र जन और पाँचवाँ अश्वतराश्व का पुत्र बुडिल। ये पाँचों मिलकर विचार करने लगे कि आत्मा क्या है, बह्म क्या है? निश्चय ही ये प्रश्न बड़े गम्भीर तथा चुनौती-भरे थे; किन्तु इन जिज्ञासुओं में भी सत्य को जानने की प्रबल इच्छा थी; अतः उन्होंने निश्चय किया कि हमें अरुणवंशीय उद्दालक ऋषि के निकट जाना चाहिए, जो इस समय का महान् आत्मवित् है।
वह उस वैश्वानर आत्मा को जानता है, जो समस्त विश्व में विद्यमान है। जब निश्चय हो गया कि उन्हें महर्षि उद्दालक के समीप जाना चाहिए, तो वे वहाँ गए। अब एक विचित्र स्थिति पैदा हो गई। यों तो लोक में प्रसिद्ध था कि उद्दालक आत्मतत्त्व के ज्ञाता है, किन्तु उनका ज्ञान भी इतना प्रशस्त नहीं था कि वे उपर्युक्त जिज्ञासुओं के सभी प्रश्नों का उत्तर दे देते। अतः स्वयं की कठिनाई को समझकर, उन्होंने पहले ही निश्चय कर लिया था कि वे इन आगन्तुकों को कैकेय राजा के पुत्र अश्वपति के निकट भेजेंगे। अतः उसने उक्त पाँचों व्यक्तियों को स्पष्ट कहा कि इस समय वैश्वानर आत्मा का सच्चा जानकार अश्वपति ही है। आओ, हम सब मिलकर उसके समीप चलें और उससे ही अपनी शंकाओं का समाधान करें।
अब वे राजा अश्वपति के पास पहुँचे। राजा ने आर्योचित शिष्टाचार से उनकी पूजा (सत्कार) की। प्रातः होने पर वह स्वयं ब्रह्मतत्त्व के उन जिज्ञासुओं के निकट गया और उनसे कहा - न मे स्तेनो जनपदे, न कदर्यो, न मद्यपो, नानाहिताग्निर्नोविद्वान्, न स्वैरी, स्वैरिणी कुतः - मेरे राज्य में न तो कोई चोर है, न कोई कृपण-कंजूस और न ही कोई मद्यपायी वा शराबी है। ऐसा भी कोई नहीं है, जो नित्य यज्ञाग्नि अथवा परमात्माग्नि का सेवन न करना हो, न कोई अविद्वान् है और आप सत्य माने कि मेरे राज्य में जब कोई व्यभिचारिणी स्त्री ही नहीं है, तो व्यभिचारी पुरुष कहाँ से आएगा? ऐसे पुण्य देश में आप पधारे, आपका स्वागत है। (पाठक आज के राज्यों से इसकी तुलना करें, जहांँ पर चोर, कंजूस, शराबियों और व्यभिचारियों की भरमार वा अधिकता है।)
राजा अश्वपति ने विद्वानों को बताया कि मैं भी नित्य यज्ञ करता हूँ। आप भी मेरे यज्ञ में ऋत्विक् बनें। मैं अपने अन्य ऋत्विजों को जो दक्षिणा देता हूँ, उतनी ही आपको भी दूँगा। आप मेरे यहाँ निवास करें। जिज्ञासुगण तो यज्ञ में ऋत्विक् बनने के लिए नहीं आए थे, इसलिए उन्होंने स्पष्ट कहा, "महाराज, जो व्यक्ति जिस प्रयोजन से अन्य के पास जाए, उसे अपना प्रयोजन साफ-साफ बताना चाहिए। हमारा आपके निकट आने का उद्देश्य वैश्वानर आत्मा को जानना है। आप ही इस विषय के जानकार है, अतः आप हमें इस विषय का ज्ञान कराएँ।" अश्वपति ने उन्हें कहा कि वे दूसरे दिन प्रातः उसके निकट आएँ, वह उक्त विषय को बताएगा।
सवेरा होते ही छहों जिज्ञासु विनम्र भाव से समित्पाणि होकर (हाथों में यज्ञ-हेतु गुरु को भेंट देने के लिए समिधाएँ लेकर) अश्वपति की सेवा में पहुँचे। ब्राह्मण आचार्य अपने शिष्य का उपनयन करने के पश्चात् ही उन्हें विद्या प्रदान करता है। यहाँ उपनयन करने की आवश्यकता ही नहीं थी, क्योंकि प्रथम तो छहों जिज्ञासु बड़ी अवस्था के थे, उनका यज्ञोपवीत पहले ही हो चुका था। राजा अश्वपति क्षत्रिय था, अतः वह ब्रह्मवेत्ता होने पर भी किसी गुरुकुल का अधिष्ठाता आचार्य तो था नहीं, जो अपने शिष्यों को यज्ञोपवीत प्रदान करता।
इससे पहले कि हम इस आख्यायिका को आगे बढ़ाएँ, कुछ महत्त्वपूर्ण बातें लिख देना आवश्यक है। इन जिज्ञासुओं का प्रश्न यह था कि वैश्वानर आत्मा क्या है, कैसा है, तथा उसकी उपासना कैसे की जाती है? वैश्वानरस्य सुमतौ स्याम - (यजुः० २६ । ७) - हम वैश्वानर की सुमति में हो। वस्तुतः सम्पूर्ण विश्व में विद्यमान परमात्मा ही वैश्वानर है। वही वेदों में पुरुष के नाम से वर्णित हुआ है, क्योंकि ब्रह्माण्डरूपी पुर में शयन करनेवाला, उसके प्रत्येक अणु-परमाणु में विद्यमान ब्रह्म ही यहाँ पुरुष-पदवाच्य है। उपनिषद् उसे ही वैश्वानर कहता है।
वेदादि शास्त्रों में इस वैश्वानर आत्मा को यत्र-तत्र रूपक-शैली में वर्णित किया है। जिस प्रकार मानव-शरीर में सिर, हाथ, पाँव, उदर तथा अन्य प्रत्यंग होते हैं, उसी प्रकार ब्रह्माण्डरूपी पुर में समाये (तथा उससे बाहर भी) इस पुरुष-परमात्मा के भी सिर, हाथ, पाँव, उदर, प्राण आदि की कल्पना की गई है। राजा अश्वपति आगे चलकर इन जिज्ञासु पुरुषों को यह बताएगा कि शास्त्रकारों ने जो इस परमपुरुष के अंग-प्रत्यंगों की तुलना जिन सूर्य, चन्द्र, वायु, पृथिवी आदि भूत पदार्थों से की है, वह उपचार से ही की है अर्थात् परमात्मा की शक्तियों को समझाने के लिए ही की है। हम यदि इन भौतिक तत्त्वों में भी आत्मारूप में विद्यमान परमात्म-तत्त्व को न पहचानकर मात्र इन भौतिक पदार्थों की ही पूजा-उपासना करते हैं, उन्हें अपने जीवन का सार-सर्वस्व समझते हैं, तो हम उस महत् ब्रह्म के एक पाद (अंश) मात्र की ही उपासना करते हैं। परमात्मा को उसके परिपूर्ण रूप में अथवा उसकी सभी शक्तियों सहित जानकर ही उसकी उपासना करना उचित है। इसी पृष्ठभूमि में इस आख्यायिका का अवशिष्ट भाग पढ़ना चाहिए।
अब अश्वपति ने सर्वप्रथम औपमन्यव (प्राचीनशाल) से पूछा- "आप किस आत्मा की उपासना करते हैं? आत्मा के बारे में आपकी क्या धारणा है?" उत्तर मिला, "हे राजन्, मैं तो द्यु-लोक वा प्रकाश (ज्योति) को ही आत्मा मानकर उसकी आराधना करता हूँ।" संसार में ऐसे अनेक लोग हैं, जिन्हें यह भौतिक प्रकाश ही परमात्मा प्रतीत होता है। किन्तु यदि वे गहराई से सोचेंगे, तो उन्हें विदित होगा कि यह प्रकाश तो सर्वथा भौतिक है। सूर्य, चन्द्रमा, विद्युत् तथा अग्नि ही हमें प्रकाश देते हैं। किन्तु इन प्रकाशमान पदार्थों को प्रकाश देने वाली शक्ति, तो कोई इनसे भिन्न ही है। उससे ही ये ज्योतिष्मान् पदार्थ प्रकाशयुक्त होते हैं - तस्य भासा सर्वमिदं विभाति - (कठोपनिषद)। तथापि प्रकाश की आराधना करने, उसका उपयोग करने से अनेक लाभ होते हैं। यह जानकर अश्वपति ने उत्तर दिया, "मैं तेरा अभिप्राय समझ गया। जिस प्रकाश को तू सर्वोत्कृष्ट परमात्मा जानकर उसकी उपासना करता है, उसके लाभ भी तुझे मिल रहे हैं। तुझे संसार में उत्तम योग्य पदार्थ मिल रहे हैं, खाने के लिए उत्तम अन्न, अच्छी सन्तान आदि सभी तुझे प्राप्त हैं। किन्तु एक बात समझ ले। यह प्रकाश इस वैश्वानर आत्मा का मूर्धा (सिर) स्थानीय ही है। उसका एक अंशमात्र है। यदि तेरा ज्ञान इस भौतिक प्रकाश तक ही सीमित रहेगा, तब तो इससे तेरी बुद्धि अविकसित ही रह जाएगी। तुझे तो आगे बढ़कर उस सर्वव्यापक, सच्चिदानन्द आदि लक्षणोंवाले ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करना है। अच्छा हुआ तुम मेरे समीप आए। मैं तुम्हें उसी वैश्वानर आत्मा का ज्ञान कराऊँगा।"
अब अश्वपति दूसरे जिज्ञासु की ओर मुड़ा और उससे भी उसके आराध्य के बारे में पूछा। पौलुषि सत्ययज्ञ ने बताया कि वह आदित्य (सूर्य) को ही आत्मा जानकर उसकी उपासना करता है। अश्वपति ने इस पर कहा, "निश्चय ही तू जिस आदित्य की उपासना करता है, वह तो परम पुरुष का नेत्र-स्थानीय ही है। यह उसका एकांश है। सर्वात्मा वैश्वानर तो उससे भी बड़ा है। तथापि परमात्मा के जिस एकांश की आदित्यरूप में तुम उपासना करते हो, उसके भी अनेक भौतिक लाभ तुम्हें प्राप्त हैं। देखो, खच्चरियों से खींचे जानेवाला रथ तुम्हारे पास है। घर में दास-दासियाँ सेवा करती हैं। अच्छा भोजन तुम्हें उपलब्ध है। तेरे प्रियजन तेरे समीप हैं। वस्तुतः वैश्वानर के उपासक को ये सभी भौतिक सुख तो मिलते ही हैं। किन्तु यह स्मरण रख कि जिस आदित्य को परमात्मा मानकर तू उसकी उपासना करता है, वह आदित्य तो परमपुरुष का नेत्रस्थानीय है।" शास्त्रों में सूर्य को परमात्मा का नेत्र ही कहा गया है। पुनः अश्वपति बोला, "एक अकेले सूर्य को ही परमात्मा का स्थानापन्न माननेवाला, तो स्वयं भी अंधा ही है, क्योंकि वह प्रभु के व्यापक स्वरूप की अनदेखी करता है। अच्छा हुआ जो तू मेरे पास आया और तूने वैश्वानर आत्मा की जिज्ञासा की।"
अब वह इन्द्रद्युम्न की ओर उन्मुख हुआ और वही प्रश्न उससे भी किया - उसका आराध्यदेव कौन-सा है? भाल्लवी के पुत्र इन्द्रद्युम्न ने बताया कि मैं प्रबल शक्तिमान् वायु को ब्रह्म जानकर उसकी उपासना करता हूँ। वायु की उपासना एक प्रकार की प्राणोपासना भी है, जिसका साधन है प्राणायाम। योगीजन प्राणायाम को ईश्वर-प्रणिधान का एक साधनमात्र मानते हैं। वह अपने-आप में कोई बड़ा लक्ष्य नहीं है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार ये पाँच तो योग के बहिरंग हैं, जबकि धारणा, ध्यान और समाधि को योग का अन्तरंग माना गया है। तथापि, प्राणोपासना के भी लाभ हैं। जैसा कि अश्वपति ने बताया, "प्राणोपासक को लोग अनेक मूल्यवान् उपहार देते हैं, अनेक सम्पन्न लोग अपने रथों (वाहनों) में बैठकर उसका अनुसरण करते हैं। तथापि यह ध्यान रखने की बात है कि परमात्मा का प्राणस्थानीय यह मातरिश्वा वायु भी परम उपास्य नहीं है। इन आदित्य, वायु आदि को भी शक्ति देनेवाले वैश्वानर आत्मा को जानना ही मनुष्य का चरमोद्देश्य होना चाहिए।"
चतुर्थ जिज्ञासु शर्कराक्ष के पुत्र जन से जब यही प्रश्न पूछा गया तो उसने उत्तर दिया कि मैं तो आकाश (सर्वत्र प्रसरित अवकाश) को ही ईश्वर मानकर पूजता हूँ। इस पर राजा ने कहा, "ठीक है, तू आकाश का उपासक है, किन्तु याद रख कि आकाश तो परमात्मा के दिव्य शरीर का मध्यभाग (धड़) ही है। इसे ही जानना पर्याप्त नहीं है। तुम्हारा लक्ष्य तो महत्तम परमात्मा को जानना होना चाहिए।"
पांचवे जिज्ञासु अश्वतराश्व के वंशज बुडिल को सम्बोधित करके राजा ने पूछा, तू किसे 'आत्मा' समझकर उसकी उपासना करता है ? उसने उत्तर दिया, हे राजन् ! मैं तो 'जल' को आत्मा मानकर उसकी उपासना करता हूं। राजा ने कहा, ठीक है, 'वैश्वानर-आत्मा' का यह रूप तो है ही, परन्तु पूर्ण-रूप यह नहीं है। इसके अनेक रूपों में जो 'रयि' सम्पत्ति, ऐश्वर्य रूप है, उसकी तू उपासना करता है। इसी कारण तू रयिमान् अर्थात् सम्पत्तिमान् तथा पुष्टिमान् है। उसी के अनुग्रह से तू अन्न खाता है, प्रिय देखता है। जो इस प्रकार 'वैश्वानर-आत्मा' के रयि-रूप की उपासना करता है, उसे प्रभु के प्रसाद से अन्न मिलता है, वह प्रिय-दर्शन होता है, उसके कुल में ब्रह्मवर्चस दीख पड़ता है। यह रयि-रूप जल, 'वैश्वानर-आत्मा' का, जिसे तू खोज रहा है, बस्ति-प्रदेश मूत्राशय है। तेरा बस्ति-प्रदेश नष्ट हो जाता, अगर तू ब्रह्म के पूर्ण-रूप के जानने के लिये मेरे पास न आता।
अन्तिम प्रश्न छठवें जिज्ञासु अरुण के वंशक ऋषि उद्दालक से पूछा गया, तो उसने उत्तर दिया कि वह पृथिवी को ही सर्वोपरि पूज्य मानकर उसकी पूजा करता रहा है। पृथिवी तो सबकी प्रतिष्ठा है, जड़-चेतन का आधार है, उन्हें धारण करती है। राजा ने स्वीकार किया, "निश्चय ही पृथिवी हम सबका आधार है, प्रतिष्ठा है, किन्तु इस धरित्री को तो शास्त्रों ने परमात्मा का पादस्थानीय ही माना है। अतः तुझे तो उस ईश्वर को जानना चाहिए, जिसके पाँवों की कल्पना तत्त्वज्ञ ऋषियों ने पृथिवीरूप में की है।"
इस प्रकार जब प्रश्नोत्तर का प्रसंग समाप्त हुआ, तो अश्वपति ने समग्र विषय का पुनः ऊहापोह करते हुए कहा, "निश्चय ही आपने जिन प्रकाश, आदित्य, वायु, आकाश, जल और पृथिवी को अपना पूज्य बताया, वह एकांश में तो ठीक ही है, क्योंकि ये सभी तत्त्व परमात्मा से ही निर्मित हैं, किन्तु उपासक को इन्हीं तक नहीं रहना है। एक कदम आगे बढ़कर उसे यह जानना चाहिए कि आदित्य, वायु, आकाश और पृथिवी आदि पदार्थों का धारक, उत्पादक तथा उन्हें शक्ति देनेवाला, वह परमतत्त्व कौन-सा है? अरे! वही तो वैश्वानर आत्मा है, जिसके पुण्य वरदानों को पाकर हम संसार में सुखपूर्वक जीते हैं, अन्नादि भोग्य पदार्थों को प्राप्त करते हैं।" अब उसी परमपुरुष का पुनः रूपकात्मक वर्णन करते हुए अश्वपति बोला, "उस अखण्ड, सर्वत्र परिपूर्ण आत्मा का शोभन प्रकाश ही सिर है, द्युलोक ही उसकी मूर्धा है, विश्वरूप सर्वज्ञान ही उसके नेत्र हैं, जीवनशक्ति के तुल्य वायु ही उसका प्राण है, आकाश ही उसका मध्यम देह (धड़) है, रयिरूप जल ही उसकी बस्ति है, पृथिवी ही उसके पाँव हैं, यज्ञवेदी को ही विद्वान् उसका वक्ष कहते हैं, यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली कुशाएँ ही लोम वा बाल हैं, गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि और आहवनीयाग्नि क्रमशः उसके हृदय, मन तथा मुख हैं। ऐसे एक, अखण्ड, निष्कल वैश्वानर परमात्मा को प्रादेशमात्र = प्रत्येक देश में अथवा सर्वव्यापक और सर्वज्ञ जानकर उसकी उपासना करना ही विराट् उपासना है।"
"*संसार में रहकर मनुष्य जो कुछ करे, उसे परमात्मा के प्रति समर्पित भाव से करे। उस स्थिति में जब वह भोजन करेगा, तो वह भी उसके स्वार्थ के लिए न होकर शरीररूपी दिव्यलोक की रक्षा के लिए किए जाने वाले यज्ञ की ही कोटि में आ जाएगा।* अब साधक को चाहिए कि जब वह भोजन के प्रथम पाँच ग्रास ले, तो क्रमशः प्राणाय स्वाहा, व्यानाय स्वाहा, अपानाय स्वाहा, समानाय स्वाहा तथा उदानाय स्वाहा - इन पाँच मंत्रों का उच्चारण करे। ऐसा करने से उसका भोजन भी अग्निहोत्र के तुल्य हो जाएगा। सत्य तो यह है कि बिना ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त किए, तो अग्निहोत्र करना भी वैसा ही है, जैसे कोई आग के अंगारों को छोड़कर राख में हवन करे, जबकि परमात्मा को जानकर किया जानेवाला अग्निहोत्र उपासक के सारे पापों/पाप-भावनाओं को उसी प्रकार भस्म कर देता है, जिस प्रकार अग्नि की एक चिंगारी तृणसमूह को भस्म कर देती है।"
ध्यातव्यम् - छान्दोग्योपनिषद् की इस कथा का अधिकांश भाग डॉ॰ भवानीलाल भारतीय द्वारा कृत उपनिषदों की कथाएं और कुछ भाग डॉ॰ सत्यव्रत सिद्धान्तालंकार कृत एकादशोपनिषद् से है।
लेख सम्पादनकर्ता - आचार्य विजय आर्य
