उपनिषदों में क्षत्रिय राजाओं द्वारा ऋषियों/ब्राह्मणों को ब्रह्मविद्या का उपदेश - भाग १
प्रश्न - क्या ब्राह्मणों को ही अध्यात्म-संबंधी कथा करने अथवा शिक्षा देने का अधिकार है, किसी अन्य वर्ण के व्यक्ति को नहीं?
उत्तर - ऐसा कोई आवश्यक नहीं है, जिस व्यक्ति के पास भी ब्रह्मविद्या है, वह जिज्ञासु को उसका उपदेश कर सकता है। उपनिषदों में अनेकों प्रमाण है, जिसमें क्षत्रिय राजाओं द्वारा ब्रह्मविद्या से शून्य ऋषियों/ब्राह्मणों को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया गया। अतः जिस व्यक्ति के पास भी ब्रह्मविद्या अथवा ब्रह्मज्ञान हो, चाहे वह किसी भी वर्ण का हो, वह उसका उपदेश कर सकता है। मुख्य बात यही है कि जिसके पास ब्रह्मविद्या है अथवा जो ब्रह्म को जानता है, वही ज्ञान-गुण से एक प्रकार का ब्राह्मण ही है, चाहे वह जन्म से किसी भी वर्ण का हो अथवा किसी अन्य वर्ण का कर्म भी करता हो। अतः उसको प्राप्त-ब्रह्मविद्या के उपदेश का अधिकार है।
राजा प्रवाहण द्वारा ऋषि आरुणि/गौतम को ब्रह्मविद्या का उपदेश - छान्दोग्योपनिषद् ५।३-१०
राजा प्रवाहण के श्वेतकेतु से पाँच प्रश्न
आरुणि ऋषि का पुत्र श्वेतकेतु पञ्चाल देश के क्षत्रियों की एक सभा में आया। वहाँ जीवल का पुत्र जैबलि प्रवाहण नाम का राजा उपस्थित था। उसने श्वेतकेतु से पूछा - हे कुमार ! क्या तुम्हारे पिता ने तुम्हें ब्रह्मविद्या सिखाई है? उत्तर में श्वेतकेतु ने स्वीकार किया कि "हाँ, उसने पिता से अध्यात्मविद्या सीखी है।" इस पर राजा ने उससे पाँच प्रश्न किए -
१. प्रजाएँ मरकर जहाँ जाती है, उस लोक को क्या तू जानता है?
२. मृत प्रजाएँ वा जीव लौटकर पुनः यहाँ आते हैं, क्या तू इस रहस्य को जानता है?
३. देवयान और पितृयान मार्गों के अन्तर को क्या तू जानता है?
४. प्रजाओं की निरन्तर वृद्धि होने पर भी वह लोक (वा परलोक) भर नहीं जाता, इसका क्या कारण है?
५. पाँचवीं आहुति में हवन किया हुआ जल पुरुष के वचन का हो जाता है, क्या तू इसे जानता है?
श्वेतकेतु ने कहा कि इन पाँच प्रश्नों में से वह किसी एक का भी उत्तर नहीं दे सकता। इस पर राजा ने कहा, "जो मनुष्य इन गूढ़ प्रश्नों के उत्तर नहीं दे सकता, भला वह अपने-आपको सुशिक्षित कैसे कह सकता है।" श्वेतकेतु परास्त और लज्जित होकर स्वगृह लौट आया और अपने पिता से बोला, "आपने मुझे अध्यात्मविद्या की शिक्षा दिए बिना ही कह दिया कि तू शिक्षित हो चुका। मेरे उस क्षत्रिय मित्र राजा प्रवाहण ने मुझसे पाँच प्रश्न पूछे और मैं उनमें से एक का भी उत्तर नहीं दे सका।" जब पुत्र ने आरुणि से उन प्रश्नों की जिज्ञासा की, तो उसने स्वीकार किया कि इन प्रश्नों का समाधान तो वह स्वयं भी नहीं कर सकता। उसने स्पष्ट माना कि यदि वे रहस्य मुझे अवगत होते, तो भला मैं तुझे क्यों नहीं बताता !
अब श्वेतकेतु का पिता स्वयं राजा प्रवाहण के निकट आया। राजा ने आगत अतिथि का सम्मान किया। प्रातःकाल होते ही आरुणि/गौतम (पिता) राजा की सभा में उपस्थित हुआ, तो राजा ने उसे यथेच्छ धन देने की इच्छा प्रकट की। गौतम तो ब्रह्मविद्या जानने के लिए आया था, इसलिए उसने कहा, "महाराज, यह लौकिक धन मुझे नहीं चाहिए। आपने मेरे पुत्र को जो प्रश्न पूछे, मुझे तो उनके उत्तर जानने की ही इच्छा है।" इसे सुनकर एक बार तो राजा को इसलिए दुःख वा पीड़ा हुई कि देखो, आज ब्राह्मण कहलानेवाले भी अध्यात्मविद्या से हीन हो गए हैं।
अब उसने गौतम को अपने समीप चिरकाल वा पर्याप्त समय तक व्रत धारण करते हुए रहने के लिए कहा। जब व्रत समाप्त हुआ, तो राजा प्रवाहण ने पुनः गौतम से कहा, "अब मैं तुम्हें वह विद्या अवश्य दूँगा, किन्तु याद रखो कि यह अध्यात्मविद्या का रहस्य पूर्वकाल के ब्राह्मणों को भी अज्ञात था, इसलिए समस्त लोकों में क्षत्रिय ही का अधिकार था। तुम ही इसके प्रथम श्रोता हो।" राजा के इस कथन से ऐसा विदित होता है कि उस युग में ब्राह्मण लोग प्रायः कर्मकाण्ड सम्बन्धी यज्ञ-यागादि करने-कराने में ही लिप्त रहते थे, किन्तु राजन्य-वर्ग ब्रह्मचर्चा में लगा रहता था। उपनिषदों में प्रायः ब्रह्मविद्या के जितने प्रवक्ता हुए हैं, वे अधिकांश में क्षत्रिय हैं। इस तथ्य को बताकर राजा ने गौतम के प्रश्नों का उत्तर दिया। उत्तर देते समय प्रवाहण ने सबसे पहले पंचम प्रश्न को लिया -
प्रश्न ५. - पाँचवीं आहुति में हवन किया हुआ जल पुरुष के वचन का हो जाता है, इसका तात्पर्य क्या है?
उत्तर - राजा प्रवाहण ने बताया कि भगवद्भक्ति भी यज्ञ में श्रद्धा के रूप में की जा सकती है। तब यह द्यु-लोक ही यज्ञ की पहली अग्नि है। उस अग्नि में सूर्य समिधा-तुल्य है। अग्नि से पैदा होनेवाला धुआँ सूर्य की रश्मियाँ हैं; दिन का प्रकाश ही उस लोक-यज्ञाग्नि की ज्वालाएँ हैं; चन्द्रमा को ही आग का अंगारा मानना होगा और इसमें नक्षत्र चिंगारियां है। इस महान् लौकिक यज्ञ को हम निरन्तर निसर्ग (प्रकृति) में होता देख रहे हैं। देव अर्थात् विद्वान् पुरुष इस यज्ञ में श्रद्धा का चारु (होम करने योग्य पदार्थ) बनाकर अर्थात् परमात्मा द्वारा संसार में किए जाने वाले लौकिक वा सृष्टि यज्ञ में श्रद्धा-चारु वा सत्यधारणा की आहुति देते हैं। इस श्रद्धा रूपी जल की आहुति से इस यज्ञ में सोम राजा का जन्म होता है, अर्थात् श्रद्धा से ही सौम्य भाव वाले परम पुरुष परमात्मा के दर्शन होते हैं।
इसी क्रम में प्रवाहण ने यज्ञाग्नि के लिए अन्य चार रूपकों का भी उल्लेख किया है। यह पर्जन्य यज्ञ की दूसरी अग्नि है। उस अग्नि में वायु समिधा है, अभ्र = जलयुक्त कोहरा/धुंध धुआं है, विद्युत् ज्वाला है, वज्र अंगारे है, गर्जन चिंगारियां हैं। इस पर्जन्य-रूप यज्ञाग्नि में देव-गण सोम-राजा अर्थात् जलीय-वाष्प की आहुति देते हैं और उस वाष्प रूपी जल की आहुति से 'वर्षा' होती है। यह पृथिवी यज्ञ की तीसरी अग्नि है। इस अग्नि में संवत्सर समिधा है, आकाश धुंआ है, रात्रि ज्वाला है, दिशाएं अंगारे है, अवान्तर वा दिशाएं चिंगारियां हैं। इस पृथिवी-रूप यज्ञाग्नि में देवगण वर्षा की आहुति देते हैं, और उस वर्षा रूपी जल की आहुति से 'अन्न' उत्पन्न होता है।
यह पुरुष यज्ञ की चतुर्थ अग्नि है। इस अग्नि में वाणी समिधा है, प्राण धुंआ है, जिह्वा ज्वाला है, आंख अंगारे हैं, कान चिनगारियां हैं। इस पुरुष-रूप यज्ञाग्नि में देव-गण अन्न की आहुति देते हैं, और उस आहुति से 'रेतस्'- 'वीर्य' उत्पन्न होता है। यह स्त्री यज्ञ की पंचम अग्नि है। इस स्त्री-रूप यज्ञाग्नि में देव-गण रेतस् की आहुति देते हैं, और उस आहुति से गर्भ होता है। इस प्रकार पांचवीं आहुति में जल पुरुष की तरह वाणी को बोलने लगते है। वह उल्ब/जरायु (झिल्ली) में लिपटा हुआ गर्भ दस वा नौ मास तक, या जिस समय तक भी हो, माता के अन्दर शयन कर उत्पन्न होता है।
इस प्रकार अन्त में स्त्री-पुरुष द्वारा सन्तानोत्पादन को भी एक यज्ञ ही बताया, जिससे पुत्र-लाभ होता है। सद्गृहस्थ होकर धर्मपूर्वक दाम्पत्य जीवन व्यतीत करना भी अग्निपरिचर्या वा अग्निहोत्र का सेवन ही है। वह गर्भ, सन्तान रूप से उत्पन्न होकर जितनी भी आयु हो, तब तक जीता है। मर जाने के बाद, उसे यहां से अग्नियां ही निर्दिष्ट स्थान को ले जाती हैं। जहां से यहां आया था, यहां से जहां जायगा - यह सब अग्नि ही करती है।
अब क्रमशः अन्य प्रश्नों के उत्तर सुनो ।
प्रश्न १. - प्रजाएँ मरकर जहाँ जाती है, उस लोक को क्या तू जानता है ?
उत्तर - जन्मा हुआ मनुष्य अपनी आयु की नियत तिथि तक शरीर धारण किए रहता है। अन्त में जब उसकी मृत्यु होती है, तो वह ईश्वरी व्यवस्था के अनुसार अन्य योनि में जाता है। यह प्रथम प्रश्न का उत्तर है कि मरने के पश्चात् जीवात्मा अपने शुभाशुभ कर्मों के अनुसार अन्य योनियों को प्राप्त होता है।
प्रश्न ३. - देवयान और पितृयान मार्गों का क्या अन्तर है?
उत्तर - अब देवयान और पितृयान के भिन्न-भिन्न मार्गों का वर्णन करते हैं। जो अध्यात्मज्ञान-सम्पन्न मनुष्य आरण्यक जीवन व्यतीत करते हुए, जब तपस्यायुक्त आयु भोगकर शरीरत्याग करते हैं, तो उनका मार्ग देवयान का होता है। इसके द्वारा वे तेजोमय ब्रह्म का साक्षात्कार करते हैं, यही देवयान है। किन्तु जो लोग ग्रामों या नगरों में रहकर सकाम कर्म करते हैं, वे या तो वैदिक यज्ञ-यागादि में प्रवृत्त रहते हैं अथवा लोक-हितार्थ कूप, तड़ाग, धर्मशालाएँ आदि बनाते हैं। प्रथम वर्णित वैदिक यज्ञों का करना इष्ट कर्म है और सामान्यजनों की भलाई के लिए कुएँ खुदवाना, धर्मशाला आदि स्थान बनवाना आपूर्त कर्म कहलाते हैं। इस प्रकार सकाम कर्म करने वाले उपासक मोक्ष को तो प्राप्त नहीं करते, किन्तु निश्चित् अवधि तक स्वर्गलोक में निवास कर अर्थात् सुखों का अनुभव कर, पुनः सृष्टिचक्र में आते हैं और नया जीवन धारण करते हैं। इसे ही पितृयान कहा गया है।
प्रश्न २. - मृत प्रजाएँ वा जीव लौटकर पुनः यहाँ आते हैं, इसका रहस्य क्या है?
उत्तर - शुभ आचरण करनेवाले लोगों को आगे भी शुभ जन्म ही मिलता है। वे स्वकर्मानुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य कुल में जन्म लेते हैं और द्विजोचित कर्म करते हैं। इसके विपरीत अशुभ और दुष्ट आचरण करनेवालों को कुत्ता, सूअर और चाण्डाल आदि की पतित योनियाँ प्राप्त होती हैं।
प्रश्न ४. - प्रजाओं की निरन्तर वृद्धि होने पर अर्थात् लोगों के निरन्तर जन्म लेने पर भी वह लोक (वा परलोक) भर क्यों नहीं जाता, इसका क्या कारण है?
उत्तर - उत्तर स्पष्ट है। जो देवयान या पितृयान में से किसी एक भी गति को प्राप्त नहीं करते, उनके लिए तो बार-बार जन्म लेने और बार-बार मरने की ही गति विधाता ने लिख दी है। वे जायस्व और म्रियस्व (जन्मो और मरो) इसी द्वन्द्व में पड़े रहते हैं। 'पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननीजठरे शयनम्' से ही उनका छुटकारा नहीं होता। तब भला यह लोक या परलोक क्यों भरेगा? यह आवागमन तो निरन्तर चलता ही रहेगा। किन्तु यह आवागमन का चक्र है, निन्दित = जुगुप्सायुक्त। इससे छूटने का प्रयास ही वास्तविक पुरुषार्थ है।
आख्यायिका के उपसंहार में उपनिषद्-प्रवचनकर्ता आचार्य ने बताया कि पाँच महापापों का सेवन करनेवाले निश्चय ही आवागमन से नहीं छूटते।
ये पंच महापाप हैं -
१. स्वर्ण की चोरी (साधारण चोरी भी पाप रही है)।
२. मदिरापान।
३. गुरुपत्नी से व्यभिचार।
४. ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण वा विद्वानों को मारना, (सामान्य हत्या भी पाप ही है)।
५. उपर्युक्त चार प्रकार के पापियों का समर्थन करना भी महापाप है।
अपने उपदेश को समाप्त करते हुए राजा प्रवाहण ने ब्राह्मण गौतम को कहा, "जो ज्ञानी उपासक इस उपनिषद्-विद्या को जानता है, वह स्वयं अपने जीवन को शुद्ध एवं पवित्र बनाता है तथा पापों से कभी लिप्त नहीं होता। वह तीनों लोकों को पवित्र मानता है तथा उनकी रक्षा करता है- "त्रायते भुवनत्रयम्।"
ध्यातव्यम् - छान्दोग्योपनिषद् की इस कथा का अधिकांश भाग डॉ॰ भवानीलाल भारतीय द्वारा कृत उपनिषदों की कथाएं और कुछ भाग डॉ॰ सत्यव्रत सिद्धान्तालंकार कृत एकादशोपनिषद् से है।
लेख सम्पादनकर्ता - आचार्य विजय आर्य
