परमात्मा का ज्ञान - वेद
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परमात्मा का ज्ञान - वेद

आचार्य विजय आर्य

Nov 4, 2025

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वह कौनसा ज्ञान है, जो परमात्मा के असीम ज्ञान में सनातन रूप से प्रतिष्ठित रहता है और प्रत्येक सृष्टि के आदि में ऋषियों के माध्यम से संसार के कल्याणार्थ परमात्मा द्वारा प्रदान किया जाता है?

वह कौनसा ज्ञान है, जिसे हमारे प्राचीन महापुरुष और ऋषि-मुनि सर्वश्रेष्ठ मानकर पढ़ते-पढ़ाते रहे, परन्तु जिसे हम उन महापुरुषों और ऋषि-मुनियों की सन्तानों ने पढ़ना-पढ़ाना छोड़ दिया अथवा इतना महत्वपूर्ण नहीं माना?

वह है ईश्वरीय सनातन विद्या - वेद ज्ञान!

इसी प्रकार वेदवर्णित ओ३म् मुख्य नामक परमेश्वर ही सृष्टि के आदि काल से हमारे महापुरुषों और ऋषि-मुनियों का उपासनीय परमदेव रहा; परन्तु हम ने उसे छोड़कर अन्य देव, जो स्वयं वेदोक्त परमदेव की सन्ध्या द्वारा उपासना करते थे, उन्हीं को उपासनीय मान लिया।

आइये इन वेदों को पढ़े और वेदोक्त ईश्वर की उपासना करें। श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों ने स्वयं वेदों को पढ़कर अपने जीवन को ऊंचा उठाया -

श्रीराम वेदवेदाङ्गवेत्ता थे

वाल्मीकि रामायण में श्रीराम का गुण वर्णन करते हुए नारद मुनि कहते हैं -

रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता। वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः॥ बालकाण्ड १/१४

- श्रीराम स्वधर्म और स्वजनों के पालक, वेद-वेदाङ्गों के तत्त्ववेत्ता तथा धनुर्वेद में प्रवीण हैं॥

हनुमान् स्वयं वेदों के विद्वान् थे

वाल्मीकि रामायण के अनुसार हनुमान् वेद और व्याकरण पढ़े हुये थे और इसलिये शुद्ध उच्चारण करते थे। जब हनुमान् ने प्रथम मिलन में श्रीराम और लक्ष्मण से शुद्ध भाषा में वार्तालाप करके उनकी प्रशंसा करी और अपना परिचय दिया, तब श्रीराम ने उनके विषय में लक्ष्मण से कहा -

वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धा काण्ड, तृतीय सर्ग

नानृग्वेद-विनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः। नासामवेदविदुषः शक्यमेवं विभाषितुम्॥२८॥

- 'जिसे ऋग्वेद की शिक्षा नहीं मिली, जिसने यजुर्वेद का अभ्यास नहीं किया तथा जो सामवेद का विद्वान् नहीं है, वह इस प्रकार सुन्दर भाषा में वार्तालाप नहीं कर सकता' ॥२८॥

नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम्। बहु व्याहरतानेन न किंचिदपशब्दितम् ॥२९॥

- 'निश्चय ही इन्होंने सम्पूर्ण व्याकरण ‌का कई बार स्वाध्याय किया है; क्योंकि बहुत-सी बातें बोलने से भी इनके मुख से कोई अशुद्धि नहीं निकली'॥२९॥

श्रीकृष्ण भी वेदवेदाङ्गों के विद्वान् थे -

वेदवेदाङ्गविज्ञानं बलं चाप्यधिकं तथा। नृणां लोके हि कोऽन्योऽस्ति विशिष्टः केशवादृते ॥ महाभारत, सभा० ३८ । १९

- भीष्म पितामह श्रीकृष्ण की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि - ये वेद-वेदाङ्गों के तो मर्मज्ञ हैं ही, बलशाली भी सबसे अधिक हैं। कृष्ण के अतिरिक्त संसार के मनुष्यों में दूसरा कौन सबसे बढ़कर है?

जिन वेदों को महापुरुषों ने भी पढ़ा और उसको पढ़कर विद्वान् हुए, उन वेदों को अपने से विमुख करना कहां तक उचित है?

सब दर्शन ग्रंथ, उपनिषद और यहां तक मनुस्मृति विशेष कर वेदों की ही प्रशंसा करते हैं और अत्रि स्मृति में भी वेद से बढ़कर कोई शास्त्र नहीं माना गया है -

महर्षि अत्रि के अनुसार—

नास्ति वेदात् परं शास्त्रम्। (अत्रिस्मृति १५१)

- वेद से बढ़कर कोई शास्त्र नहीं है।

गरुड़पुराण में भी कहा है - वेदाच्छास्त्रं परं नास्ति [ गरुड़० उ० ख० ब्र० का० १० । ५५ ]

- वेद से बढ़कर संसार में कोई शास्त्र नहीं है।

इसलिए महर्षि मनु ने मनुस्मृति में कहा है -

योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्। स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः॥ मनु० २।१६८

- जो द्विज वेद को न पढ़कर अन्यत्र वेदविरुद्ध ग्रन्थों के अध्ययन में व्यर्थ परिश्रम करता है, वह जीते-जी परिवार-सहित शूद्रत्व को प्राप्त हो जाता है।

वेदश्चक्षुः सनातनम् [मनु० १२ । ९४ ]

- वेद मानवमात्र के लिए सनातन चक्षुः हैं।

वेदोऽखिलो धर्ममूलम्। (मनु २-६)

- अखिल-चारों वेद धर्म के मूल हैं।

महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं―

यज्ञानां तपसाञ्चैव शुभानां चैव कर्मणाम्। वेद एव द्विजातीनां निःश्रेयसकरः परः ।।

―(याज्ञ० स्मृ० १/४०)

अर्थ―यज्ञ के विषय में, तप के सम्बन्ध में और शुभ-कर्मों के ज्ञानार्थ, द्विजों के लिए वेद ही परम कल्याण का साधन है।

अत्रिस्मृति श्लोक ३५१―

श्रुतिः स्मृतिश्च विप्राणां नयने द्वे प्रकीर्तिते। काणःस्यादेकहीनोऽपि द्वाभ्यामन्धः प्रकीर्तितः ।।

अर्थ―श्रुति=वेद और स्मृति―ये ब्राह्मणों के दो नेत्र कहे गये हैं। यदि ब्राह्मण इनमें से एक से हीन हो तो, वह काणा होता है और दोनों से हीन होने पर अन्धा होता है।

बृहस्पतिस्मृति ७९ में वेद की प्रशंसा इस प्रकार की गई है―

अधीत्य सर्ववेदान्वै सद्यो दुःखात् प्रमुच्यते। पावनं चरते धर्मं स्वर्गलोके महीयते।।

अर्थ―वेदों का अध्ययन करके मनुष्य शीघ्र ही दुःखों से छूट जाता है, वह पवित्र धर्म का आचरण करता है और स्वर्गलोक में महिमा को प्राप्त होता है।

यह सब संक्षेप में बताया गया है, सभी शास्त्रों में और भी वेद की प्रशंसा में वाक्य भरे पड़े हैं।

वेद बनाम अष्टादश पुराण

वेद में एक ही ओ३म् मुख्य नाम वाचक परमदेव की उपासना है, जिसके शिव, विष्णु, ब्रह्मा, ब्रह्म, अग्नि, वायु आदि गुण-कर्म-स्वभाव अनुसार अन्य गौण नाम भी हैं।

इसके विपरीत अष्टादश पुराणों में प्रत्येक पुराण अपने अपने देव को ऊंचा बताता है और दूसरे देवों को नीचा दिखाता और अपने मुख्य देव का दास बताता है। इस प्रकार विष्णु को मानने वाले वैष्णव, शिव को मानने वाले शैव और देवी को मानने वाले शाक्त मतों में परस्पर ईर्ष्या-द्वेष दिखाने वाले यह सब ग्रंथ हैं। ऐसे परस्पर विरोधी ग्रन्थों को पढ़ने से कुछ भी लाभ नहीं है। वेदों में ऐसा द्वेषभाव नहीं है, केवल एक ईश्वर की पूजा है। इसके अतिरिक्त वेद ईश्वर प्रदत्त ज्ञान होने से निर्दोष हैं, और पुराण मानव रचित हैं, इसलिए इनमें त्रुटि होनी संभव है। अतः वेद स्वतः प्रमाण कहे गए हैं और दूसरे ग्रंन्थों को परतः प्रमाण माना गया है।

अष्टादश पुराणों में अनेक असत्य भरे हुये हैं, महापुरुषों की निंदा है, अश्लीलता है, व्यभिचार है -

शिवपुराण, गीताप्रेस गोरखपुर, रुद्रसंहिता, युद्धखंड ५, अध्याय २३ में बताया गया कि विष्णु ने जालंधर की पत्नी वृंदा का शीलहरण किया और शिवपुराण, गीताप्रेस गोरखपुर, रुद्रसंहिता, युद्धखंड ५, अध्याय ४१ में बताया गया कि विष्णु द्वारा शंखचूड की पत्नी तुलसी का शीलहरण किया गया।

भागवत पुराण में श्रीकृष्ण परनारी कंस की दासी कुब्जा से समागम कर रहे हैं, और रासलीलाओं में भी परनारीगमन चल रहा है। इसी भागवत पुराण में शिव जी को अपनी पत्नी सती के सामने ही मोहिनी के पीछे भगाया गया और भागते-भागते वीर्यपात करा दिया गया।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में महापुरुष कृष्ण को परनारी विरजा के साथ समागम करते दिखाया गया, जिसके कारण राधा ने उन्हें चोर-जार कहकर पृथ्वी पर जन्म लेने का शाप दिया।

पुराणों में ब्रह्मा जैसे ऋषि और देव को अपनी पुत्री सरस्वती पर ही आसक्त दिखाया है।

इसलिये ऐसे अपने महापुरुषों की निंदायुक्त असत्य मिश्रित ग्रन्थों को त्यागकर ईश्वर प्रदत्त पूर्ण सत्य वेदज्ञान को प्राप्त करना चाहिए। वेद की वास्तविक पुराण - पुराने वा प्राचीनतम ग्रन्थ हैं अथवा कुछ अन्य विद्वान् ऋषियों के बनाये हुए वेदव्याख्या ग्रंथ - शतपथ, गोपथ, ऐतरेय और तांड्य आदि ब्राह्मण ग्रंथों को पुराण कहते हैं।

केवल इतना कह सकते हैं कि जो अष्टादश पुराणों में जो वेदानुकूल सत्य बातें हैं, उनका ही ग्रहण करना चाहिए, शेष असत्य का त्याग कर देना चाहिए। परंतु इनमें क्या वेदविरुद्ध असत्य हैं और क्या वेदानुकूल सत्य हैं, उसके निर्णय के लिए पहले वेद ही पढ़ने चाहिए। हमारे कुछ अन्य महाभारत और वाल्मीकि रामायण, मनुस्मृति आदि ऐतिहासिक और स्मृति ग्रन्थों में भी प्रक्षेप हुए हैं, जिन्हें विद्वानों के सहयोग से आर्य प्रकाशनों द्वारा शुद्ध करके छापा गया है, उनको ही पढ़ना चाहिए।

॥ओ३म् तत्सत्॥

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