प्राचीन भारतीय साहित्य में जल: वेदों की दृष्टि
वेदों में जल को अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र तत्त्व माना गया है। यहाँ जल की उत्पत्ति, गुण, उपयोगिता, शुद्धता और संरक्षण पर स्पष्ट विचार मिलता है। साथ ही जल को दूषित करना पाप माना गया है।
1. वेदों में जल की उत्पत्ति
वेदों में जल की उत्पत्ति के विषय में यह बताया गया है कि उसमें अग्नि और वायु दोनों तत्त्व विद्यमान हैं—
(क)
अग्नीषोमी विभ्रति आपः इत् ताः। (अथर्ववेद ३.१३.५)
अर्थ:
अग्नि और सोम के संयोग से जल की उत्पत्ति होती है।
(ख)
अप्सु आसीन् मातरिश्वा प्रविष्टः। (अथर्ववेद १०.८.४०)
अर्थ:
जल में मातरिश्वा अर्थात् वायु का प्रवेश है।
(ग)
वैश्वानरो अग्निः प्रविष्टः ता आपः। (ऋग्वेद ७.४९.४)
अर्थ:
जल में वैश्वानर अग्नि भी विद्यमान है।
2. वेदों में जल की उपयोगिता
वेदों में जल को जीवनदायी, औषधीय और अमृत स्वरूप बताया गया है—
(क)
अप्सु अन्तर्विद्यानि भेषजा।
आपश्च विश्वभेषजीः। (ऋग्वेद १.२३.२०)
अर्थ:
जल में औषधीय गुण विद्यमान हैं और यह समस्त जगत के रोगों का नाश करने वाला है।
(ख)
अफ्वन्तरमृतम् अप्सु भेषजम्। (ऋग्वेद १.२३.१९)
अर्थ:
जल के भीतर अमृत और औषधि निहित है।
(ग)
आपः पृणीत भेषजम्। (ऋग्वेद १.२३.२१)
अर्थ:
हे जल! हमें औषधि और स्वास्थ्य प्रदान करो।
(घ)
आपो रसेन समगस्महि। (ऋग्वेद १.२३.२३)
अर्थ:
हम जल के रस से परिपूर्ण होकर बल और जीवन प्राप्त करें।
3. जल प्रदूषण का निषेध
वेदों में जल को दूषित करने का स्पष्ट निषेध किया गया है—
(क)
माऽपो हिंसीः, मा ओषधीः हिंसीः। (यजुर्वेद ६.२२)
अर्थ:
जल को हानि मत पहुँचाओ और वनस्पतियों को भी नष्ट मत करो।
(ख)
अपः पिन्व, ओषधीर्जिन्व। (यजुर्वेद १४.८)
अर्थ:
जल को बढ़ाओ और वनस्पतियों को पुष्ट करो।
(ग)
(ऋग्वेद ६.३९.५ — भावार्थ)
अर्थ:
हे परमात्मा! हमें प्रदूषण-रहित (निर्विष) जल, औषधियाँ और वन प्रदान करो।
4. यज्ञ और जल शुद्धि
(क)
अपो देवीः सिन्धुभ्यः कार्य हविः। (ऋग्वेद १.२३.१८)
अर्थ:
नदियों और जल के लिए यज्ञ करना चाहिए, जिससे जल शुद्ध और पवित्र बना रहे।
वेदों के अनुसार यज्ञ की सुगन्धित वायु जल के प्रदूषण को कम करने में सहायक होती है। आधुनिक अध्ययनों में भी जल की गुणवत्ता (pH, BOD आदि) में सुधार के संकेत मिले हैं।
5. जल प्रदूषण: एक पाप
मनुस्मृति में प्रदूषण को पाप बताया गया है—
महायन्त्रप्रवर्तनम् … उपपातकम्। (मनु ११.६३–६६)
अर्थ:
ऐसे कार्य जो वायु और जल को दूषित करते हैं, वे पाप के समान हैं।
निष्कर्ष
वेदों के अनुसार—
जल जीवन, औषधि और अमृत है
जल में अग्नि और वायु जैसे तत्त्व विद्यमान हैं
जल को दूषित करना पाप है
जल संरक्षण और शुद्धता अनिवार्य है
अतः स्पष्ट है कि वैदिक परंपरा में जल को केवल एक भौतिक तत्त्व नहीं, बल्कि जीवन और स्वास्थ्य का आधार माना गया है, जिसकी रक्षा करना मानव का कर्तव्य है।
संदर्भ ग्रंथ सूची
1.ऋग्वेद, ऋषि दयानन्द सरस्वती भाष्य सहित. दिल्ली: गोविन्दराम हासनन्द प्रकाशन।
2.अथर्ववेद, पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी भाष्य सहित. दिल्ली: गोविन्दराम हासनन्द प्रकाशन।
3.यजुर्वेद, ऋषि दयानन्द सरस्वती भाष्य सहित. दिल्ली: गोविन्दराम हासनन्द प्रकाशन।
4.मनुस्मृति, अनुवादक: गंगानाथ झा. इलाहाबाद: इलाहाबाद लॉ जर्नल प्रेस।
5.द्विवेदी, कपिलदेव. वेदों में विज्ञान. वाराणसी: विश्वविद्यालय प्रकाशन।
