क्या वायुकाय सूक्ष्म कीटाणु और वृक्षादि स्थावर जीवों को सुख-दुःख होता है?
पौधे और वृक्षों में आत्मा होता है, परंतु इनको बाहर से कुछ सुख-दुःख की अनुभूति नहीं होती, क्योंकि उसमें इन्द्रियों के बाहरी गोलक नहीं होते। वृक्षों में ज्ञानेन्द्रियों के बाहरी अंग नहीं होते, जैसे मनुष्य में आंख, नाक, कान, जिह्वा और त्वचा होते हैं। जैसे अंधे मनुष्य को अच्छे और बुरे कुछ भी रूप का पता नहीं होता, कानों से रहित मनुष्य को अच्छी और बुरी ध्वनि का कुछ भी पता नहीं लगता, इसी प्रकार बाह्य इन्द्रियों के अवयव न होने से वृक्ष को बाहर से कुछ भी सुख-दुःख अनुभव नहीं होता, इसलिए वृक्षों को काटने, तोड़ने से कोई हिंसा भी नहीं होती। फिर वेदो में भी शाकाहार करने का ही विधान है। हां, मनुस्मृति में वृक्षों में केवल आन्तरिक चेतना मानी गई है, परंतु उसमें भी कई लोगों का मत है कि मूर्च्छा अथवा बेहोशी की तरह वृक्ष की आन्तरिक अवस्था होती है और इसके कारण भी वह सुख-दुःख का कुछ अनुभव नहीं कर पाता।
पौधों के अपवाद (छुई-मुई आदि)
अब इसमें कुछ अपवाद प्रतीत होने वाले पौधे भी हैं - जैसे छुई-मुई का पौधा। कुछ लोग कह सकते हैं कि यदि पौधों में बाहरी त्वचा इन्द्रिय नहीं होता, तो फिर वह छूने से उसके पत्ते बंद क्यों हो जाते हैं?
इसका उत्तर यह दिया जा सकता है कि केवल हाथ से छूने से वह बंद नहीं होता, परंतु किसी भी वस्तु के छूने से उसके पत्ते बंद हो जाते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि वह कोई अच्छे-बुरे स्पर्श को मानकर और उससे सुख-दुःख का अनुभव करके पत्ते बंद नहीं करता, परंतु उसमें एक निश्चित् क्रिया का विधान परमात्मा ने किया हुआ है कि किसी भी वस्तु के स्पर्श से उसके पत्ते सिकुड़ जाते हैं।
परंतु मनुष्य से उसका भेद है कि जैसे मनुष्य को कोई कांटेदार, खुरदरी, तीखी वा अति उष्ण वस्तु से छुआ जाएगा, तो वह हाथ को तुरन्त वापस कर लेगा, परंतु फूल के अथवा कोमल वस्तु के स्पर्श करने पर वह हाथों को पीछे नहीं खींचता।
कीटभक्षी पौधे (Pitcher plant, Venus flytrap)
इसी प्रकार एक पिक्चर (pitcher) नामक कीटभक्षी पौधा होता है, जिसमे कीड़ों को पकड़ने के लिए एक छेद होता है और कीड़ों के प्रवेश करते ही कीड़ा उसमें विद्यमान द्रव्य में डूब कर मर जाता है और पौधा उस छिद्र का मुख बंद करके उस कीट का भक्षण कर लेता है, तो यह भी एक निश्चित् क्रिया हुई।
परंतु वह छिद्र में कुछ भी प्रवेश होने पर इसी प्रकार की क्रिया करता है, इसका अर्थ यह हुआ कि उसमें यह कार्य सुख-दुःख, भूख-प्यास वा बुद्धि प्रयोग के कारण से नहीं, अपितु एक निश्चित् क्रिया से उसमें ऐसा होता है।
इसी प्रकार वीनस फ्लाईट्रैप (Venus fly trap) भी कीटों को पकड़ लेता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसा पौधा बुद्धिपूर्वक अथवा सोच समझ से नहीं करता क्योंकि उसमें नर्वस सिस्टम वा तंत्रिका प्रणाली और मस्तिष्क नहीं होता है कि वह किसी उद्देश्य को सोचकर ऐसा करता है, परंतु उसमें यह एक निश्चित् क्रिया है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण (जगदीश चन्द्र बसु)
भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बसु ने पेड़-पौधों में जीवन तो माना है, परंतु उन्होंने उसमें सुख-दुःख, भूख-प्यास के रूप से जीवन नहीं कहा है, परन्तु वृद्धि और कुछ निश्चित् क्रियाएं जैसे श्वास-प्रश्वास, जलादि भोजन ग्रहण करना, मुरझाना इत्यादि होने के कारण से जीवन माना है।
स्वामी दयानन्द का मत (सत्यार्थ प्रकाश)
वायुकाय आदि सूक्ष्म कीटाणु और वृक्ष आदि स्थावर जीवों के विषय में स्वामी दयानंद सत्यार्थ प्रकाश के द्वादश समुल्लास में लिखते हैं—
देखो! पीड़ा उसी जीव को पहुंचती है, जिस की वृत्ति सब अवयवों के साथ विद्यमान हो।
पञ्चावयवयोगात् सुखसंवित्तिः॥
—सांख्यशास्त्र ५/२७
जब पांचों इन्द्रियों का पांच विषयों के साथ सम्बन्ध होता है, तभी सुख वा दुःख की प्राप्ति जीव को होती है।
जैसे बधिर को गाली, अन्धे को रूप, शून्य बहिरी वालों को स्पर्श, पिन्नस रोग वाले को गन्ध और शून्य जिह्वा वाले को रस प्राप्त नहीं हो सकता, इसी प्रकार उन जीवों की भी व्यवस्था है।
देखो! जब मनुष्य सुषुप्ति दशा में रहता है, तब उसे सुख-दुःख की प्राप्ति नहीं होती, क्योंकि बाह्य इन्द्रियों से सम्बन्ध नहीं रहता।
जैसे डॉक्टर नशा देकर शरीर के अंग काटते हैं और रोगी को दुःख अनुभव नहीं होता, वैसे ही वायुकाय या स्थावर जीव भी अत्यन्त मूर्छित होने से सुख-दुःख का अनुभव नहीं करते।
निष्कर्ष
अतः स्पष्ट है कि—
सुख-दुःख की अनुभूति इन्द्रियों के माध्यम से होती है।
स्थावर जीवों में बाह्य इन्द्रियों का अभाव होने से उन्हें पीड़ा का अनुभव नहीं होता।
इसलिए शाकाहार को हिंसा नहीं कहा जा सकता।
