क्या वेद हिंसा सिखाते हैं? – वेदों में शत्रु-दमन और प्रजा-रक्षा का वास्तविक अर्थ
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क्या वेद हिंसा सिखाते हैं? – वेदों में शत्रु-दमन और प्रजा-रक्षा का वास्तविक अर्थ

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Kartik Iyer

Mar 12, 2026

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भारतीय वैदिक परम्परा को अक्सर अहिंसा और करुणा की संस्कृति के रूप में देखा जाता है। यह धारणा केवल उत्तरवर्ती ग्रन्थों या दार्शनिक परम्पराओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें स्वयं वेदों में भी दिखाई देती हैं। वेदों में जहाँ कहीं हिंसा या युद्ध का उल्लेख मिलता है, वह सामान्य या अकारण हिंसा के समर्थन के रूप में नहीं, बल्कि धर्मरक्षा, समाज-रक्षा और शत्रु-दमन के संदर्भ में है। साथ ही अनेक मन्त्रों में अनावश्यक हिंसा और द्वेष का निषेध भी स्पष्ट रूप से किया गया है।

1. शत्रुओं के विरुद्ध युद्ध या दण्ड का निर्देश

वेदों में समाज की सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए कभी-कभी शत्रुओं के विरुद्ध शक्ति प्रयोग का उल्लेख मिलता है। उदाहरण के लिए अथर्ववेद (5.21.1) में दुन्दुभि (युद्ध का ढोल) को संबोधित करते हुए कहा गया है कि वह शत्रुओं के हृदय में भय और वैमनस्य उत्पन्न करे और उन्हें पराजित करे। इस मन्त्र का आशय यह है कि जब समाज या राज्य पर शत्रुओं का आक्रमण हो, तब उन्हें रोकने और परास्त करने के लिए युद्ध या शक्ति का प्रयोग आवश्यक हो सकता है। इस मन्त्र में शत्रुओं के लिए “अमित्र” शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ है – जो मित्र न हो, अर्थात् शत्रु या समाज के विरोधी।

इसी प्रकार ऋग्वेद (1.103.6) के भाष्य में यह बताया गया है कि समाज को ऐसे साहसी और न्यायप्रिय सेनापति की आवश्यकता होती है जो दुष्टों और अधर्मियों से समाज की रक्षा कर सके। यहाँ युद्ध या दण्ड का उद्देश्य केवल दुष्टों का दमन है, न कि सामान्य लोगों पर अत्याचार। दुष्ट और अधर्मी लोगों के लिए “परिपन्थी” (मार्ग में बाधा डालने वाला, डाकू या लुटेरा) तथा “अयज्वन्” (जो यज्ञ या धर्म का पालन नहीं करता) जैसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं। मन्त्र में ऐसे व्यक्तियों के विरुद्ध कठोरता का उल्लेख किया गया है, क्योंकि वे समाज की व्यवस्था और धर्म का उल्लंघन करते हैं।

इन मन्त्रों से स्पष्ट है कि वैदिक दृष्टिकोण में शक्ति का प्रयोग धर्म और न्याय की रक्षा के लिए किया जाता है, न कि व्यक्तिगत क्रोध, लालच या हिंसक प्रवृत्ति के कारण।

2. अकारण हिंसा का निषेध

वेदों में अनेक स्थानों पर यह भी कहा गया है कि मनुष्य को दूसरों के प्रति द्वेष, क्रूरता और अनावश्यक हिंसा से बचना चाहिए। उदाहरण के लिए ऋग्वेद (1.84.11) की व्याख्या में यह संकेत मिलता है कि ईश्वर मनुष्यों को ऐसा कारण न बनने दे जिससे वे दूसरों पर अन्यायपूर्ण हिंसा करें।

इसके अतिरिक्त वैदिक साहित्य में “मित्रता, समन्वय और सद्भाव” की भावना को अत्यधिक महत्व दिया गया है। ऋग्वेद का प्रसिद्ध मन्त्र —

“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्”
(ऋग्वेद 10.191.2)

मनुष्यों को एक साथ चलने, संवाद करने और परस्पर समन्वय रखने का संदेश देता है। यह स्पष्ट संकेत है कि वैदिक आदर्श समाज का आधार सहयोग और सौहार्द है, न कि हिंसा।

वेदों में सभी को मित्र मानने और एकता के साथ रहने का स्पष्ट संदेश दिया गया है। यजुर्वेद (36.18) में "मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्" मंत्र द्वारा यह कामना की गई है कि सभी प्राणी मुझे मित्र की दृष्टि से देखें और मैं भी सभी को मित्र की दृष्टि से देखूँ। 

3. वैदिक दृष्टि में धर्म और शक्ति का संतुलन

वेदों की दृष्टि में आदर्श समाज वह है जहाँ न्याय और करुणा दोनों का संतुलन हो। यदि समाज पर आक्रमण करने वाले दुष्टों को रोका न जाए तो व्यवस्था और धर्म की रक्षा संभव नहीं रहती। इसलिए शत्रु-दमन को आवश्यक माना गया है। परन्तु यह शक्ति केवल रक्षा और न्याय के लिए है; व्यक्तिगत स्वार्थ या अकारण हिंसा के लिए नहीं।

इस प्रकार वेदों की मूल भावना यह है कि—

  • अकारण हिंसा अनुचित है।

  • दुष्टों और आक्रमणकारियों से समाज की रक्षा आवश्यक है।

  • शक्ति का प्रयोग केवल धर्म और न्याय की रक्षा के लिए होना चाहिए।

4. वैदिक दृष्टि में शत्रु-दमन और राज्य का कर्तव्य

वेदों में सामान्य जीवन के लिए मैत्री, एकता और सद्भाव का उपदेश मिलता है, किन्तु साथ ही यह भी स्पष्ट कहा गया है कि जो लोग समाज, राष्ट्र या प्रजा के प्रति द्रोह करते हैं, उनके विरुद्ध राजा और सेना को कठोरता से कार्य करना चाहिए। वैदिक मन्त्रों में अनेक स्थानों पर यह शिक्षा दी गई है कि राज्य का प्रमुख कर्तव्य प्रजा की रक्षा करना तथा दुष्ट और शत्रु प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों को दण्ड देना है। इस संदर्भ में ऋग्वेद और अथर्ववेद के कुछ मन्त्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।

यस्य विश्वानि हस्तयोः पञ्च क्षितीनां वसु।

स्पाशयस्व यो अस्मध्रुग् दिव्येवाशनिर्जहि॥  (ऋग्वेद 1.39.2 )

इस मन्त्र में उस शासक का वर्णन है जिसके हाथों में सम्पूर्ण प्रजा और राष्ट्र की संपत्ति तथा व्यवस्था निहित है।राजा का कर्तव्य है कि जो व्यक्ति प्रजा के प्रति द्रोह करे या समाज को हानि पहुँचाए, उसे कठोर दण्ड दिया जाए। ऋषि दयानन्द भाष्य के अनुसार ऐसे दुष्ट को आकाश की बिजली के समान तीव्र दण्ड देकर नष्ट करना चाहिए, जिससे समाज में न्याय और व्यवस्था बनी रहे।

इन्द्र जामय उत येऽजामयोऽर्वाचीनासो वनुषो युयुज्रे ।

त्वमेषां विथुरा शवांसि जहि वृष्ण्यानि कृणुही पराचः ॥३॥ (ऋग्वेद 6.25.3)

इस मंत्र  में  शत्रु सेना को परास्त करने की शिक्षा है । ऋषि दयानन्द भाष्य के आधार पर इस मन्त्र में सेनापति से कहा गया है कि जो शत्रु निकट हों या दूर, यदि वे समाज को हानि पहुँचाने का प्रयास करें तो उनका दमन किया जाए। राज्य की सेना को सुदृढ़ और शक्तिशाली बनाना तथा शत्रु सेना को पराजित करना सेनापति का प्रमुख कर्तव्य बताया गया है। इसका उद्देश्य केवल विजय नहीं, बल्कि समाज की सुरक्षा और धर्म की रक्षा है।  

सायणाचार्य के अनुसार यहाँ दो प्रकार के शत्रुओं का उल्लेख है—एक वे जो निकट रहते हैं और दूसरे वे जो दूर देश में स्थित हैं। जब ये शत्रु आक्रमण के लिए तैयार हों, तब उनकी शक्ति और सेना को नष्ट करना आवश्यक है। राजा और सेना को चाहिए कि वे शत्रुओं को पराजित कर उन्हें युद्धभूमि से पीछे हटने के लिए विवश करें। यहाँ “जामयः” शब्द उन शत्रुओं के लिए प्रयुक्त है जो निकट सम्बन्धी या परिचित रूप में हमारे आसपास रहते हुए विरोध करते हैं। इसके विपरीत “अजामयः” वे शत्रु हैं जो दूर देश में स्थित होते हुए भी विरोधी या आक्रमणकारी होते हैं। इसी प्रकार “अर्वाचीनासः” उन शत्रुओं को सूचित करता है जो हमारी ओर बढ़ते हुए या सामने उपस्थित होकर आक्रमण के लिए तैयार होते हैं, जबकि “वनुषः” का अर्थ है हानि पहुँचाने वाले या हिंसा करने वाले शत्रु। जब ऐसे शत्रु युद्ध के लिए उद्युक्त होकर संगठित होते हैं, तब उनके “शवांसि” अर्थात् बल और सेनाशक्ति को “विथुरा” अर्थात् दुर्बल और नष्ट कर देना चाहिए। आगे यह भी कहा गया है कि उनके वीर्य और सामर्थ्य का नाश कर उन्हें “पराचः” अर्थात् पराङ्मुख या पीछे हटने के लिए विवश कर दिया जाए। इस प्रकार भाष्य में शत्रुओं को निकट और दूर—दोनों प्रकारों में विभाजित करके उनके दमन और पराजय की बात कही गई है।

यत इन्द्र भयामहे ततो नो अभयं कृधि।
मघवञ्छग्धि तव त्वं न ऊतिभिर्वि द्विषो वि मृधो जहि॥ (अथर्ववेद 19.15.1 )

इस मन्त्र में राजा से प्रार्थना की गई है कि वह प्रजा को भय से मुक्त करे और उनकी रक्षा करे। जिससे लोग भयभीत होते हैं, उस शत्रु या दुष्ट शक्ति को राजा अपनी शक्ति और व्यवस्था से नष्ट करे। राजा का धर्म है कि वह द्वेष रखने वालों और युद्ध उत्पन्न करने वाले शत्रुओं का दमन करे और समाज में शान्ति स्थापित करे। 

वेदों में शत्रु या विरोधी के लिए एक ही शब्द नहीं, बल्कि अलग-अलग संदर्भों में विभिन्न शब्द मिलते हैं, जैसे-

  • सपत्न्यः – प्रतिद्वन्द्वी

  • जामयः – निकट शत्रु

  • अजामयः – दूरस्थ शत्रु

  • अमित्र – जो मित्र न हो

  • द्विषन्तः – द्वेष करने वाले

  • अराति – विरोधी या उपद्रवकारी

निष्कर्ष

वेदों को यदि समग्र रूप में देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि वे हिंसा के समर्थक नहीं हैं। जहाँ युद्ध या दण्ड का उल्लेख है, वह केवल शत्रुओं और अधर्मियों के विरुद्ध है, ताकि समाज में न्याय और व्यवस्था बनी रहे। दूसरी ओर, सामान्य जीवन में वेद मनुष्यों को सहयोग, सद्भाव और संयम का मार्ग अपनाने का उपदेश देते हैं। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि वैदिक परम्परा अकारण हिंसा का निषेध करती है और केवल धर्मरक्षा के लिए आवश्यक शक्ति-प्रयोग को स्वीकार करती है।

संदर्भ ग्रंथ सूची

  1. ऋषि दयानन्द सरस्वती, ऋग्वेदादि भाष्य. दिल्ली: गोविन्दराम हासनन्द प्रकाशन।

  2. पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी, अथर्ववेद भाष्य. दिल्ली: गोविन्दराम हासनन्द प्रकाशन।

  3. ऋषि दयानन्द सरस्वती, यजुर्वेद भाष्य. दिल्ली: गोविन्दराम हासनन्द प्रकाशन।

  4. सायणाचार्य. ऋग्वेदसंहिता सायणभाष्य सहित. सम्पादक: वि. एस. बापट. पुणे: वैदिक संशोधन मंडल

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