गीता में निराकार ईश्वर की उपासना
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गीता में निराकार ईश्वर की उपासना

आचार्य विजय आर्य

Nov 8, 2025

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प्रश्न - क्या गीता के श्लोक १२/१ में साकार ईश्वर की उपासना का वर्णन है?

उत्तर - जब श्रीकृष्ण ने गीता के ७वें अध्याय के श्लोक २४ में ईश्वर के मनुष्य की भांति जन्मकर व्यक्ति/साकार भाव को प्राप्त करने का पहले ही निषेध कर दिया है, तो फिर अर्जुन कोई मूर्ख नहीं था कि वह १२वें अध्याय के पहले श्लोक में साकार रूप से ईश्वर की उपासना करने वाले और योग द्वारा निराकार ईश्वर की उपासना करने वालों में से श्रेष्ठ के विषय में प्रश्न पूछता। वास्तव में इस श्लोक में कहीं भी साकार शब्द का प्रयोग ही नहीं किया गया। केवल अर्जुन ने एक भक्त और एक योगी में से तुलनात्मक श्रेष्ठ के विषय में प्रश्न किया है।

कुछ लोग सगुण को साकार मानते हो, परंतु ऐसा कोई संस्कृत शब्द इस अध्याय के श्लोकों में नहीं है, जिसका अर्थ सगुण हो।

और दूसरी बात सगुण का अर्थ साकार किसी भी रूप से सिद्ध नहीं होता। सगुण का अर्थ है - गुणों के सहित और साकार का अर्थ है - आकार के सहित। ईश्वर में सर्वव्यापकता, सर्वज्ञता आदि अनेक गुण होने से वह सगुण तो है; परंतु अनन्त, सीमारहित होने से उसका कोई आकार नहीं है।

अर्जुन एक भक्त और एक योगी में से तुलनात्मक श्रेष्ठ के विषय में श्रीकृष्ण से प्रश्न करता है -

१. एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ? - १२/१

शब्दार्थ - अर्जुन कृष्ण से प्रश्न करता है, '(एवं) इस प्रकार (ये सतत-युक्ताः भक्ताः) जो निरन्तर प्रीतियुक्त भक्त [जन] (त्वाम् परि-उप-आसते) तुझे [नाम जपकर] सर्वतः उपासते हैं (च) और (ये) जो [योगीजन ध्यानयोग द्वारा तेरे] (अक्षरम् अव्यक्तम्) अविनाशी, अव्यक्त/निराकार [स्वरूप] को (अपि) ही [उपासते हैं] (तेषाम्) उनमें से (के योगवित्तमाः) कौन योगज्ञतम [हैं] ?'

भावार्थ - अर्जुन प्रश्न करता है, परमात्मा की उपासना करने वाले भक्तों तथा परमात्मा के निज/निराकार रूप के दर्शनाभिलाषी योगियों में से कौन योगज्ञतम हैं, कौन योग के मर्म को अतिशयता के साथ जाननेवाले हैं ? (क्योंकि गीता में सर्वत्र दो ही प्रकार की उपासना बताई है, एक ईश्वर के निज नाम अर्थात् ओम् जपने की और दूसरा ध्यानयोग द्वारा उपासना की, अतः यहां भक्त से तात्पर्य हुआ जो ईश्वर का ओ३म् नाम जपता है, उसको स्मरण करता है अथवा ईश्वर का भजन करता है, और योगी से तात्पर्य हुआ कि जो उसके निजस्वरूप, जो वास्तव में अव्यक्त/निराकार अथवा नेत्रों से अदृश्य है, उसका ध्यान करता है। और क्योंकि गीता में ईश्वर को साकार मान उसकी मूर्ति बनाकर पूजने का कोई भी श्लोक नहीं है, अतः ऐसी स्वकल्पित उपासना न ही किसी भक्त और न ही किसी योगी के लिए इस श्लोक में अभिप्रेत है।)

अगले ४ श्लोकों के माध्यम से श्रीकृष्ण ने बताया कि भक्त और योगी में से योगी ही श्रेष्ठ है, क्योंकि योगी ही उसके निज स्वरूप का साक्षात्कार कर पाता है और उसका परिश्रम भी अधिक होता है।

२. मय्यावेश्य मनो ये, मां नित्ययुक्ता उपासते। श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः। - १२/२

शब्दार्थ - कृष्ण उत्तर देते हैं, (ये) जो [योगी] (मयि मनः आवेश्य) मुझमें मन लगाकर (नित्य-युक्ताः) सतत समाहित रहते हुए (परया श्रद्धया उप इताः) परम श्रद्धा के साथ आत्मना युक्त हुए (माम् उप-आसते) मुझे उपासते हैं (ते से युक्त-तमाः मताः) वे मेरे युक्त-तम माने जाते हैं।

भावार्थ - जो योगी जन अपने मन को, अपनी चित्तवृत्ति को समाहित करके परम श्रद्धा [सत्य धारणा] के साथ परमात्मा से आत्मना युक्त रहते हैं, वे ही योगज्ञतम हैं। (योगदर्शन में योग की परिभाषा है - योगश्चित्तवृत्तिः निरोधः अर्थात् अपनी चित्तवृत्ति को बाह्यविषयों से हटाकर मन को ईश्वर में ध्यानयोग के द्वारा एकाग्र करने का नाम योग है। भक्त नाम तो जपता है, परंतु क्योंकि वह ध्यानयोगी की तरह अंतर्मुख नहीं होता है, अतः वह संपूर्ण रूप से अपने को ईश्वर में आत्मना एकाग्र नहीं कर सकता है, जैसे ध्यानयोगी समाधिस्थ होकर कर पाता है, अतः योगी ही श्रेष्ठ है।)

३. ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते। सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्। - १२/३

संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः। ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः। - १२/४

शब्दार्थ - (ये तु) जो तो (इन्द्रिय-ग्रामम् सम्-नियम्य) इन्द्रियों के समूह को सम्यक नियंत्रित करके (अक्षरम्, अनिःदेश्यम्, अव्यक्तम्, सर्वत्रगम्, अचिन्त्यम्, कूटस्थम्, अचलम् च ध्रुवम्) अविनाशी, अनिर्वचनीय, अव्यक्त/निराकार/अप्रकट, सर्वव्यापक, चिंतन से परे, एकरस, अचल, और स्थिर ब्रह्म को (परि-उप-आसते) सर्वतः उपासते हैं (सर्व-भूत-हिते रताः, सर्वत्र सम-बुद्धयः ते एव) सब प्राणियों के हित लीन [तथा] सर्वत्र सम-बुद्धिवाले, वे [योगी] ही (माम् प्र-आप्नुवन्ति) मुझे प्राप्त करते अथवा मेरा साक्षात्कार करते हैं।

भावार्थ - उपयुक्त गुणों से उपेत ब्रह्म का साक्षात् संदर्शन योगी ही कर पाते हैं। ईश्वर चर्म चक्षुओं से नहीं दिखता, परंतु ध्यानयोग की दृष्टि से साक्षात् किया जाता है। (इस श्लोक में यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि श्रीकृष्ण ने ईश्वर को अचल और स्थिर कहा है, क्योंकि ईश्वर को अपनी सर्वव्यापकता के कारण से, कहीं भी आने-जाने की आवश्यकता नहीं है। परंतु श्रीकृष्ण स्वयं एकदेशी थे और चलते फिरते थे, ईश्वर की तरह सर्वव्यापक, अचल, स्थिर नहीं थे, इससे यह भी स्पष्ट होता है कि श्रीकृष्ण परमात्मा नहीं थे, परंतु एक जीवात्मा थे, जिन्होंने शरीर रूपी जन्म को पाया था।)

४. क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्। अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते। - १२/५

शब्दार्थ - (तेषाम् अव्यक्त-आसक्त-चेतसाम्) उन अव्यक्त/निराकार परमात्मा में आसक्त चित्तवालों का (क्लेशः) परिश्रम [भक्तों की अपेक्षा] (अधिक-तरः) अधिकतर [होता है] (हि) क्योंकि (देह-वद्भि:) देह धारियों के द्वारा (अव्यक्ता गतिः) अव्यक्त/अ-प्रकट गति (दुःखं अवाप्यते) दुःखपूर्वक अथवा कष्ट लेने के पश्चात् प्राप्त की जाती है।

इस श्लोक में स्पष्ट लिखा है कि योगियों का परिश्रम भक्तों की अपेक्षा अधिकतर होता है, अतः वह ईश्वर के अव्यक्त स्वरूप को साक्षात् कर पाते हैं, अतः श्रेष्ठ भी हैं। एक अधिक परिश्रमी सदैव ही न्यून परिश्रम करने वाले से श्रेष्ठ होता है।

अब कोई कहे कि केवल भक्ति अथवा ईश्वर का नाम जपने, ईश्वर का भजन करने तक ही सीमित रहे, तो वह उसकी इच्छा है, परंतु जो आगे बढ़ना चाहे तो उसके लिए श्रीकृष्ण ने छठा ध्यानयोग अध्याय भी लिखा है कि किस प्रकार आसन लगाकर ईश्वर का ध्यान करना है। जो जितना परिश्रम करेगा, उसे उतना ही अधिक परिणाम मिलेगा, यह संसार का नियम है। महाभारत में स्थान-स्थान पर लिखा है कि श्रीकृष्ण प्रातः और सायं संध्योपासना अर्थात् ध्यानयोग द्वारा ईश्वर की उपासना करते थे। अब जो श्रीकृष्ण जैसे महापुरुष का मानने वाला होगा, तो वह अवश्य ही श्रीकृष्ण की तरह ईश्वर का ध्यान लगाकर उनका अनुकरण करेगा, उनकी तरह श्रेष्ठ बनने का प्रयास करेगा। जब मनुष्य ईश्वर का नाम जप कर सकता है, तो क्या नित्यप्रति १५-२० मिनट आसन लगाकर बैठकर ध्यान और जप दोनों ही क्यों नहीं कर सकता? श्रीकृष्ण का ध्यान लगाकर ईश्वर उपासना करना यह भी सिद्ध करता है कि वह ईश्वर नहीं थे क्योंकि ईश्वर को अपनी उपासना की आवश्यकता नहीं।

॥ओ३म् तत्सत्॥

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