भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का मूलस्वरूप समन्वयात्मक (synthetic) है, जिसमें बाह्य वैदिक कर्मकाण्ड, मन्त्रजप, प्राणायाम तथा ध्यान- ये सभी परस्पर विरोधी न होकर एक ही साधना-क्रम के विविध आयाम माने गए हैं। वाल्मीकि रामायण, महाभारत तथा पुराण साहित्य के प्रामाणिक साक्ष्य इस तथ्य को पुष्ट करते हैं कि प्राचीन भारतीय साधना-पद्धति बहुस्तरीय (multi-layered) थी, जिसमें बाह्य अनुशासन के माध्यम से अन्तःकरण की शुद्धि और तत्पश्चात् ध्यान द्वारा परमात्मतत्त्व की अनुभूति का क्रम निरूपित किया गया है।
वाल्मीकि रामायण में अग्निहोत्र और ध्यानोपासना
वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड (सर्ग ५४) में एक अत्यंत सुंदर प्रसंग आता है। जब राम, सीता और लक्ष्मण प्रयाग के समीप पहुँचते हैं, तब राम लक्ष्मण से कहते हैं—“हे सौमित्र! देखो, प्रयाग के पास यह जो उत्तम धूम उठ रहा है, यह भगवान अग्नि का ध्वज है; इससे प्रतीत होता है कि मुनिवर भरद्वाज मुनि यहीं समीप स्थित हैं।” यह धूम वास्तव में अग्निहोत्र यज्ञ का संकेत है, जो उस स्थान की पवित्रता और ऋषि-उपस्थिति का द्योतक है।
प्रयागमभितः पश्य सौमित्रे धूममुत्तमम्। अग्नेर्भगवतः केतुं मन्ये संनिहितो मुनिः ॥ ५॥
हुताग्निहोत्रं दृष्ट्वैव महाभागं कृताञ्जलिः। रामः सौमित्रिणा सार्धं सीताया चाभ्यवादयत् ॥ १२ ॥
(वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकाण्ड, सर्ग ५४)
- सुमित्रानन्दन ! वह देखो, प्रयाग के पास ऐश्वर्यप्रदाता अग्निहोत्र की ध्वजारूप उत्तम धूम उठ रहा है। मालूम होता है, मुनिवर भरद्वाज यहीं हैं॥ ५ ॥ महाभाग महर्षि भरद्वाज को जो अभी-अभी अग्निहोत्र समाप्त कर चुके थे, उन्हें देखकर श्रीराम ने लक्ष्मण और सीता सहित हाथ जोड़ कर प्रणाम किया।
आगे जब श्रीराम देखते हैं कि महाभाग भरद्वाज मुनि अभी-अभी अग्निहोत्र सम्पन्न कर चुके हैं, तब वे लक्ष्मण और सीता सहित विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम करते हैं। यह प्रसंग न केवल अग्निहोत्र की महिमा को दर्शाता है, बल्कि राम के विनम्र और धर्मनिष्ठ आचरण को भी उजागर करता है।
बालकाण्ड (सर्ग ३१) में यह प्रसंग आता है, जब विश्वामित्र के साथ चल रही ऋषियों की मंडली शोणभद्र नदी के तट पर विश्राम के लिए रुकती है। दिनभर की यात्रा के पश्चात् जब सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ता है, तब सभी मुनि अत्यंत संयम और एकाग्रता के साथ वहाँ पड़ाव डालते हैं। सूर्यास्त के उपरांत वे स्नान करते हैं और फिर विधिपूर्वक अग्निहोत्र संपन्न करते हैं। यह दृश्य दर्शाता है कि वैदिक ऋषि जीवन में अग्निहोत्र केवल एक कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि दैनिक अनुशासन और आध्यात्मिक साधना का अनिवार्य अंग था, जिसे वे यात्रा के दौरान भी नहीं छोड़ते थे।
वासं चक्रुर्मुनिगणाः शोणाकूले समाहिताः। तेऽस्तं गते दिनकरे स्नात्वा हुतहुताशनाः ॥ २० ॥
- जब सूर्य अस्ताचल को जाने लगे, तब उन ऋषियों ने पूर्ण सावधान रहकर शोणभद्र के तटपर पड़ाव डाला। जब सूर्यास्त हो गया, स्नान करके उन सबने अग्रिहोत्र का कार्य पूर्ण किया।
अयोध्याकाण्ड के अनेक प्रसंगों में कौसल्या का अत्यंत आदर्श, धर्मनिष्ठ और वैदिक जीवन-पद्धति से युक्त स्वरूप प्रकट होता है। वे नित्य व्रतपरायण, संयमी और मंगलाचार का पालन करने वाली रानी हैं। रेशमी वस्त्र धारण कर, पूर्ण शुद्धता और प्रसन्नता के साथ वे मंत्रोच्चारणपूर्वक अग्निहोत्र में आहुति प्रदान करती हैं। उसी समय जब राम उनके अन्तःपुर में प्रवेश करते हैं, तो वे माता को अग्निहोत्र करते हुए देखते हैं। वहाँ देवकार्य के लिए विविध सामग्री—दधि, अक्षत, घृत, मोदक, हविष्य, लाज, श्वेत मालाएँ, पायस, कृसर, समिधा तथा पूर्ण कलश—सुव्यवस्थित रूप से रखी हुई है, जो यह दर्शाता है कि अग्निहोत्र केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि पूर्ण वैदिक अनुशासन और श्रद्धा से सम्पन्न एक यज्ञीय व्यवस्था है।
इसके अतिरिक्त, कौसल्या केवल यज्ञकर्म तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे संध्योपासना, प्राणायाम और ध्यान में भी तल्लीन रहती हैं। जब श्रीराम उनके उपासना-गृह में पहुँचते हैं, तब वे मौन रहकर देवता की आराधना में लीन हैं और अपने पुत्र के लिए राजलक्ष्मी की प्रार्थना कर रही हैं। यहाँ तक कि जब उन्हें राम के युवराज अभिषेक का समाचार मिलता है, तब भी वे प्राणायाम के माध्यम से परमपुरुष जनार्दन का ध्यान करती हैं। यह सम्पूर्ण चित्रण यह स्पष्ट करता है कि कौसल्या का जीवन केवल मातृत्व तक सीमित नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक साधना, वैदिक अनुशासन और उच्च आदर्शों का संगम है।
सा क्षौमवसना हृष्टा नित्यं व्रतपरायणा।
अग्निं जुहोति स्म तदा मन्त्रवत् कृतमङ्गला॥१५॥
प्रविश्य तु तदा रामो मातुरन्तःपुरं शुभम्।
ददर्श मातरं तत्र हावयन्तीं हुताशनम्॥१६॥
देवकार्यनिमित्तं च तत्रापश्यत् समुद्यतम्।
दध्यक्षतघृतं चैव मोदकान् हविषस्तथा॥१७॥
लाजान् माल्यानि शुक्लानि पायसं कृसरं तथा।
समिधः पूर्णकुम्भांश्च ददर्श रघुनन्दनः॥१८॥
(अयोध्या काण्ड, सर्ग ४)
तत्र तां प्रवणामेव मातरं क्षौमवासिनीम्।
वाग्यतां देवतागारे ददर्शायाचतीं श्रियम्॥३०॥
तस्मिन् कालेऽपि कौसल्या तस्थावामीलितेक्षणा।
सुमित्रयान्वास्यमाना सीतया लक्ष्मणेन च॥३२॥
श्रुत्वा पुष्ये च पुत्रस्य यौवराज्येऽभिषेचनम्।
प्राणायामेन पुरुषं ध्यायमाना जनार्दनम्॥३३॥
(वाल्मीकि रामायण, अयोध्या काण्ड, सर्ग ४)
कौसल्या रेशमी वस्त्र धारण कर प्रसन्नता और व्रतपरायणता के साथ मंत्रोच्चारणपूर्वक अग्निहोत्र में आहुति दे रही थीं। उसी समय श्रीराम ने उनके अन्तःपुर में प्रवेश कर उन्हें अग्नि में हवन करते देखा। वहाँ देवकार्य के लिए दही, अक्षत, घृत, मोदक, हविष्य, लाज, श्वेत मालाएँ, पायस, कृसर, समिधा और पूर्ण कलश आदि सामग्री सुसज्जित रखी हुई थी। आगे, राम ने उन्हें उपासना-गृह में मौन होकर परमात्मा की आराधना करते हुए तथा पुत्र के लिए राजलक्ष्मी की याचना करते देखा। उस समय भी कौसल्या नेत्र बंद कर ध्यान में लीन थीं और सुमित्रा, सीता तथा लक्ष्मण उनकी सेवा में उपस्थित थे। पुत्र के अभिषेक का समाचार सुनकर भी वे प्राणायाम के माध्यम से परमपुरुष जनार्दन का ध्यान कर रही थीं।
अयोध्याकाण्ड (सर्ग ६) में राम के अत्यंत अनुशासित, वैदिक और आध्यात्मिक जीवन का सुंदर चित्रण मिलता है। पुरोहित के चले जाने के बाद श्रीराम स्नान कर, मन को संयमित कर अपनी पत्नी सीता के साथ नारायण की उपासना आरम्भ करते हैं। इसके पश्चात् वे विधिपूर्वक अग्निहोत्र में आहुति प्रदान करते हैं, यज्ञशेष का ग्रहण करते हैं और फिर मौन एवं संयमित होकर ध्यान में लीन हो जाते हैं। अंततः वे कुश की चटाई पर विश्राम करते हैं। यह प्रसंग दर्शाता है कि श्रीराम का जीवन केवल राजकाज तक सीमित नहीं था, बल्कि वे वैदिक साधना, यज्ञ, ध्यान और अनुशासन का आदर्श उदाहरण थे।
गते पुरोहिते रामः स्नातो नियतमानसः।
सह पत्न्या विशालाक्ष्या नारायणमुपागमत्॥१॥
प्रगृह्य शिरसा पात्रीं हविषो विधिवत् ततः।
महते दैवतायाज्यं जुहाव ज्वलितानले॥२॥
शेषं च हविषस्तस्य प्राश्याशास्यात्मनः प्रियम्।
ध्यायन्नारायणं देवं स्वास्तीर्णे कुशसंस्तरे॥३॥
वाग्यतः सह वैदेह्या भूत्वा नियतमानसः।
श्रीमत्यायतने विष्णोः शिश्ये नरवरात्मजः॥४॥
“पुरोहित के चले जाने के बाद श्रीराम स्नान करके मन को संयमित कर अपनी विशाललोचना पत्नी सीता के साथ नारायण परमात्मा की उपासना करने लगे। इसके पश्चात् उन्होंने हविष्य-पात्र को आदरपूर्वक ग्रहण कर प्रज्वलित अग्नि में विधिपूर्वक आहुति दी। फिर यज्ञशेष हविष्य का ग्रहण कर अपने मनोरथ की सिद्धि का संकल्प लिया और मौन एवं संयमित होकर सीता के साथ विष्णु के उपासनागृह में कुश की चटाई पर लेटकर नारायण का ध्यान करते हुए विश्राम किया।”
महाभारत में ईश्वर-प्राप्ति के लिए योग का आश्रय
अब महाभारत की चर्चा करते हैं। महाभारत, अध्याय २३९ प्रसंगों से यह स्पष्ट होता है कि महाभारत में ईश्वर-प्राप्ति के लिए ध्यानयोग, प्राणायाम और अंतर्मुख साधना को अत्यंत उच्च स्थान दिया गया है। साधना की प्रक्रिया जप से आरम्भ होकर ध्यान और समाधि तक पहुँचती है, जहाँ अंततः आत्मा और परमात्मा का अभेद अनुभव होता है।
एवं सप्तदशं देहे वृतं षोडशभिर्गुणैः।
मनीषी मनसा विप्रः पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥ १५ ॥
यहाँ महर्षि व्यास आत्मा और शरीर के तत्त्वों का विश्लेषण करते हुए बताते हैं कि जीव सोलह उपाधियों (इन्द्रियाँ, विषय, मन, प्राण आदि) से आवृत होकर भी अपने भीतर स्थित सत्रहवें तत्त्व—परमात्मा—का साक्षात्कार कर सकता है। यह साक्षात्कार बाह्य उपकरणों से नहीं, बल्कि सूक्ष्म अंतर्मन के द्वारा संभव है। ‘मनसा पश्यति’ यह संकेत करता है कि ज्ञान का अंतिम साधन आंतरिक चेतना है, न कि बाह्य क्रिया। अतः यहाँ योग की उस प्रक्रिया का संकेत है जिसमें मन ही साधन और साध्य दोनों का सेतु बन जाता है।
न ह्ययं चक्षुषा दृश्यो न च सर्वैरपीन्द्रियैः।
मनसा तु प्रदीपेन महानात्मा प्रकाशते ॥ १६ ॥
यह श्लोक अत्यंत निर्णायक है, क्योंकि यह स्पष्ट रूप से कहता है कि परमात्मा इन्द्रियों से ग्रहणीय नहीं है। आँख, कान आदि बाह्य ज्ञानेंद्रियाँ केवल भौतिक जगत को जानती हैं; वे उस तत्त्व को नहीं पकड़ सकतीं जो स्वयं प्रकाशस्वरूप है। ‘मनसा प्रदीपेन’ का अर्थ है कि शुद्ध, एकाग्र और निर्मल मन ही दीपक बनकर उस सत्य को प्रकाशित करता है। यह ध्यानयोग की अनिवार्यता को सिद्ध करता है—जहाँ मन को स्थिर और पारदर्शी बनाकर आत्मा के प्रकाश का अनुभव किया जाता है।
अशब्दस्पर्शरूपं तदरसागन्धमव्ययम्।
अशरीरं शरीरेषु निरीक्षेत निरिन्द्रियम् ॥ १७ ॥
इस श्लोक में परमात्मा के निर्गुण स्वरूप का दार्शनिक निरूपण किया गया है। वह न शब्द है, न स्पर्श, न रूप, न रस, न गंध—अर्थात् पंचभौतिक गुणों से सर्वथा परे है। फिर भी वह प्रत्येक शरीर में व्याप्त है। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि अद्वैत का सूक्ष्म सिद्धान्त है—अदृश्य होते हुए भी सर्वव्यापक होना। यहाँ साधक को निर्देश है कि वह बाह्य विषयों से हटकर, शरीर के भीतर स्थित चेतना का अनुसंधान करे। यह पूर्णतः ध्यान और आत्मवलोकन की प्रक्रिया है, जहाँ इन्द्रिय-निग्रह के बिना यह अनुभव संभव नहीं।
अव्यक्तं सर्वदेहेषु मर्त्येषु परमाश्रितम्।
योऽनुपश्यति स प्रेत्य कल्पते ब्रह्मभूयसे ॥ १८ ॥
यहाँ परमात्मा को ‘अव्यक्त’ कहा गया है—अर्थात् वह प्रत्यक्ष नहीं, परंतु सर्वत्र आधारभूत सत्ता के रूप में विद्यमान है। जो साधक इस सत्य को निरंतर ‘अनुपश्यति’—अर्थात् ध्यानपूर्वक देखता/अनुभव करता है—वह मृत्यु के बाद ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है। यह केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, बल्कि निरंतर ध्यान का परिणाम है। ‘अनुपश्यति’ शब्द संकेत करता है कि यह एक स्थायी साधना है, क्षणिक अनुभव नहीं। अतः यहाँ मोक्ष का मार्ग स्पष्टतः ध्यानयोग और आत्मदर्शन से जुड़ा हुआ है।
भीष्म द्वारा ध्यानयोग और जप का उपदेश
तद् धिया ध्यायति ब्रह्म जपन् वै संहिताम् हिताम्।
संन्यस्यत्यथवा तां वै समाधौ पर्यवस्थितः ॥ १६ ॥
भीष्म यहाँ साधना की क्रमिक प्रक्रिया बताते हैं—पहले जप, फिर ध्यान, और अंततः समाधि। वेदसंहिता, प्रणव और गायत्री का जप मन को शुद्ध और स्थिर करता है, जिससे ध्यान की क्षमता उत्पन्न होती है। परंतु जब साधक समाधि में स्थित हो जाता है, तब वह जप को भी त्याग देता है, क्योंकि साधन की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। यह दर्शाता है कि जप और ध्यान साधन हैं, और उनका लक्ष्य आत्मानुभूति है। यह एक उन्नयन (progression) है, जहाँ साधक बाह्य से आंतरिक और अंततः निराकार अनुभव की ओर अग्रसर होता है।
ध्यानमुत्पादयत्यत्र संहिताबलसंश्रयात्… ॥ १७ ॥
इस श्लोक में जप और ध्यान के पारस्परिक संबंध को स्पष्ट किया गया है। वेदसंहिता के जप से साधक में मानसिक शक्ति और एकाग्रता उत्पन्न होती है, जो ध्यान को स्थिर करती है। साथ ही, तप और इन्द्रियनिग्रह के द्वारा वह द्वेष और कामना से मुक्त होता है। यह मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है—जप से मन शुद्ध होता है, तप से दृढ़ होता है, और ध्यान से स्थिर होता है। इस प्रकार साधना एक समग्र अनुशासन बन जाती है, जहाँ आचरण, विचार और ध्यान—तीनों का संतुलन आवश्यक है।
ध्यानक्रियापरो युक्तो… ॥ २० ॥
यहाँ साधक की स्थिति का वर्णन है, जो पूर्णतः ध्यान में स्थित हो जाता है। वह निरंतर ध्यान करता हुआ, उसी के द्वारा तत्त्व का निर्णय करता है। जब ध्यान परिपक्व होता है, तो वह समाधि में परिणत होता है। फिर साधक उस ध्यानरूप क्रिया को भी त्याग देता है—क्योंकि अब साध्य की प्राप्ति हो चुकी है। यह अद्वैत अनुभव की अवस्था है, जहाँ कर्ता, कर्म और क्रिया का भेद समाप्त हो जाता है। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि ध्यान केवल अभ्यास नहीं, बल्कि आत्मा में विलीन होने की प्रक्रिया है।
स वै तस्यामवस्थायां… ॥ २१ ॥
इस अवस्था में साधक सर्वत्यागी और निष्काम हो जाता है। वह न सिद्धियों की इच्छा करता है, न किसी लौकिक फल की। यह पूर्ण वैराग्य और आत्मतृप्ति की स्थिति है। ‘निर्बीज समाधि’ का अर्थ है कि अब कोई वासना या संस्कार शेष नहीं रहता। इस अवस्था में प्राण त्यागकर साधक ब्रह्म में लीन हो जाता है। यह मोक्ष का चरम रूप है, जहाँ व्यक्ति और परमात्मा का भेद समाप्त हो जाता है। यहाँ योग का अंतिम लक्ष्य—ब्रह्मभूता अवस्था—स्पष्ट रूप से प्रतिपादित है।
पुराणों में ध्यान साधना
यद्यपि अष्टादश पुराणों के अन्तर्गत शिवपुराण में भी अन्य पुराणों की तरह महापुरुषों के विषय में अनुचित कथाओं का समावेश है और यह सब अन्य इतिहास ग्रन्थ और सत्य शास्त्रों के विरुद्ध होने से असत्य और अप्रमाण है, तथापि इसमें भी कुछ ध्यानयोग संबंधी रत्न मिल जाते हैं।
गीताप्रेस द्वारा प्रकाशित श्रीशिवमहापुराण, वायवीय संहिता, उत्तरखण्ड, अध्याय ३९ के निम्न श्लोकों में ईश्वर के साक्षात् हेतु मूर्तिपूजादि बाह्यसाधनों की अपेक्षा ध्यानयोग को उत्तम कहा है -
तीर्थानि तोयपूर्णानि देवान् पाषाणमृण्मयान्। योगिनो न प्रपद्यन्ते स्वात्मप्रत्ययकारणात्॥२९
योगिनां च वपुः सूक्ष्मं भवेत्प्रत्यक्षमैश्वरम् । यथा स्थूलमयुक्तानां मृत्काष्ठाद्यैः प्रकल्पितम् ॥ ३०
यथेहान्तश्चरा राज्ञः प्रियाः स्युर्न बहिश्चराः । तथान्तर्ध्याननिरताः प्रियाश्शम्भोर्न कर्मिणः ॥ ३१
बहिष्करा यथा लोके नातीव फलभोगिनः । दृष्ट्वा नरेन्द्रभवने तद्वदत्रापि कर्मिणः ॥ ३२
- अपने आत्मा एवं परमात्मा का बोध प्राप्त करने के कारण-प्रयोजन से योगीजन जल से भरे हुए तीर्थों और पत्थर एवं मिट्टी की बनी हुई देवमूर्तियों का आश्रय नहीं लेते [ वे आत्मतीर्थ में अवगाहन करते और आत्मदेव के ही भजन में लगे रहते हैं ] ॥ २९ ॥
- जैसे अयोगी पुरुषों को मिट्टी और काठ आदि की बनी हुई स्थूल मूर्तियों का प्रत्यक्ष होता है, उसी तरह योगियों को ईश्वर के सूक्ष्म स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन होता है अर्थात् योगरहित पुरुष स्थूल मूर्तियों को ही देख पाते हैं, परंतु योगीजन ईश्वर के सूक्ष्म स्वरूप का दर्शन करते हैं ॥ ३० ॥
- जैसे अपने अन्तःपुर में विचरनेवाले स्वजन एवं परिजन राजा के प्रिय होते हैं और बाहर के लोग उतने प्रिय नहीं होते, उसी प्रकार अन्तःकरण में ध्यान लगानेवाले भक्त ही शम्भू अर्थात् कल्याणकारी परमात्मा के अधिक प्रिय हैं, बाह्य [मूर्तिपूजा जैसे] उपचारों का आश्रय लेनेवाले कर्मकाण्डी नहीं ॥ ३१ ॥
-- जैसे लोक में यह देखा गया है कि बाहरी लोग राजा के भवन में राजकीय पुरुषोचित फल का उपभोग नहीं कर पाते, केवल अन्तःपुर के लोग ही उस फल के भागी होते हैं, उसी प्रकार यहाँ बाह्यकर्मी [मूर्ति आदि बाह्यविषयों में आसक्त] पुरुष उस फल को नहीं पाते, जो ध्यानयोगियों को सुलभ होता है ॥ ३२ ॥
ऋषि उपमन्यु द्वारा श्रीकृष्ण को ध्यानयोग की शिक्षा
श्रीशिवमहापुराण, वायवीय-संहिता, उत्तरखण्ड, अध्याय ३९ के निम्न श्लोक प्रमाणों में ऋषि उपमन्यु श्रीकृष्ण को ध्यानयोग की शिक्षा देते हैं -
ध्याता ध्यानं तथा ध्येयं यद्वा ध्यानप्रयोजनम् । एतच्चतुष्टयं ज्ञात्वा ध्याता ध्यानं समाचरेत् ॥ १४
ज्ञानवैराग्यसम्पन्नो नित्यमव्यग्रमानसः । श्रद्दधानः प्रसन्नात्मा ध्याता सद्धिरुदाहृतः ॥ १५
ध्यै चिन्तायां स्मृतो धातुः शिवचिन्ता मुहुर्मुहुः ॥ १६
अव्याक्षिप्तेन मनसा ध्यानमित्यभिधीयते ॥ १८
बुद्धिप्रवाहरूपस्य ध्यानस्यास्यावलम्बनम् । ध्येयमित्युच्यते सद्भिस्तच्च साम्बः स्वयं शिवः ॥ १९
विमुक्तिप्रत्ययं पूर्णमैश्वर्यं चाणिमादिकम् । शिवध्यानस्य पूर्णस्य साक्षादुक्तं प्रयोजनम् ॥ २०
यस्मात्सौख्यं च मोक्षं च ध्यानादुभयमाप्नुयात् । तस्मात्सर्वं परित्यज्य ध्यानयुक्तो भवेन्नरः ॥ २१
नास्ति ध्यानं विना ज्ञानं, नास्ति ध्यानमयोगिनः। ध्यानं ज्ञानं च यस्यास्ति तीर्णस्तेन भवार्णवः ॥ २२
ज्ञान प्रसन्नमेकाग्रमशेषोपाधिवर्जितम् । योगाभ्यासेन युक्तस्य योगिनस्वेव सिध्यति ॥ २३
- ध्याता, ध्यान, ध्येय और ध्यान-प्रयोजन — इन चार को जानकर ध्यान करनेवाला पुरुष ध्यान करे ॥ १४ ॥
- जो ज्ञान और वैराग्य से सम्पन्न हो, सदा शान्तचित्त रहता हो, श्रद्धालु हो और जिसकी बुद्धि प्रसादगुण से युक्त हो, ऐसे साधक को ही सत्पुरुषों ने ध्याता कहा है ॥ १५ ॥
- 'ध्यै चिन्तायाम्' यह धातु है। इसका अर्थ है चिन्तन। शिव वा कल्याणकारी परमात्मा का बारंबार चिन्तन ही ध्यान कहलाता है ॥ १६ ॥
- श्रद्धापूर्वक विक्षेपरहित चित्त से परमेश्वर का जो चिन्तन है, नाम का नाम 'ध्यान' है ॥ १८॥
- बुद्धि के प्रवाहरूप ध्यान का जो आलम्बन या आश्रय है, उसी को साधु पुरुष 'ध्येय' कहते हैं। स्वयं साम्ब सदाशिव परमेश्वर ही वह ध्येय हैं।
- मोक्ष-सुख का पूर्ण अनुभव और अणिमा आदि ऐश्वर्य की उपलब्धि– ये पूर्ण शिव वा कल्याणकारी परमात्मा के ध्यान के साक्षात् प्रयोजन कहे गये हैं।
- ध्यान से सौख्य और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है, इसलिये मनुष्य को सब कुछ छोड़कर ध्यान में लग जाना चाहिये ॥ २१॥
- बिना ध्यान के ज्ञान नहीं होता और जिसने योग का साधन नहीं किया है, उसका ध्यान नहीं सिद्ध होता। जिसे ध्यान और ज्ञान दोनों प्राप्त हैं, उसने भवसागर को पार कर लिया।
- समस्त उपाधियों से रहित, निर्मल ज्ञान और एकाग्रतापूर्ण ध्यान - ये योगाभ्यास (अष्टांग योग) से युक्त योगी को ही सिद्ध होते ॥ २३॥
प्रक्षीणाशेषपापानां ज्ञाने ध्याने भवेन्मतिः । पापोपहतबुद्धीनां तद्वार्तापि सुदुर्लभा ॥ २४
अत्यल्पोऽपि यथा दीपः सुमहन्नाशयेत्तमः । योगाभ्यासस्तथाल्पोऽपि महापापं विनाशयेत् ॥ २६
ध्यायतः क्षणमात्रं वा श्रद्धया परमेश्वरम् । यद्भवेत् सुमहच्छ्रेयस्तस्यान्तो नैव विद्यते ॥ २७
नास्ति ध्यानसमं तीर्थं, नास्ति ध्यानसमं तपः। नास्ति ध्यानसमो यज्ञस्तस्माद्ध्यानं समाचरेत् ॥ २८
- जिनके सारे पापभाव नष्ट हो गये हैं, उन्हीं की बुद्धि ज्ञान और ध्यान में लगती है। जिनकी बुद्धि पाप से दूषित है, उनके लिये ज्ञान और ध्यान की बात भी अत्यन्त दुर्लभ है।
- जैसे बहुत छोटा दीपक भी महान् अन्धकार का नाश कर देता है, इसी तरह थोड़ा-सा योगाभ्यास भी महान् पाप-पापभावना का विनाश कर डालता है।
- श्रद्धापूर्वक क्षणभर भी परमेश्वर का ध्यान करने वाले पुरुष को जो महान् श्रेय प्राप्त होता है, उसका कहीं अन्त नहीं है।
- ध्यान के समान कोई तीर्थ नहीं है, ध्यान के समान कोई तप नहीं है और ध्यान के समान कोई यज्ञ नहीं है; इसलिये ध्यान अवश्य करे।
(अतः सभी को उचित है कि हृदयस्थ परमात्मा की ध्यानयोग द्वारा उपासना करें, जैसा कि सब योगीजन आसन लगाकर करते हैं। ईश्वर की उपासना योगाभ्यास अर्थात् नेत्र बंद करके ईश्वर का ध्यान करके करनी चाहिए। अष्टांग योग के सभी आठ अंगों - यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की विस्तृत जानकारी के लिए श्रीशिवमहापुराण, वायवीय-संहिता, उत्तरखण्ड, अध्याय ३७ के श्लोक पढ़ें, जिसमें ऋषि उपमन्यु श्रीकृष्ण को योग की शिक्षा देते हैं अथवा महर्षि पतञ्जलि कृत योगदर्शन ग्रन्थ का अध्ययन करें।)
[ न ह्यम्मयानि तीर्थानि, न देवा मृच्छिलामयाः। - देवीभागवत पुराण ९/७/४२
- जलमय तीर्थ, तीर्थ नहीं है और मृण्मय तथा प्रस्तरमय अर्थात् मिट्टी और पत्थर के देवता भी देवता नहीं हैं। (यह श्लोकार्थ गीताप्रेस द्वारा प्रकाशित श्रीमद्देवीभागवत महापुराण, द्वितीय खण्ड के अनुसार है।) ]
संदर्भ ग्रंथ एवं पुस्तकें
वाल्मीकि रामायण, गीता प्रेस, गोरखपुर।
महाभारत (शांतिपर्व, द्रोणपर्व सहित), गीता प्रेस, गोरखपुर।
शिव पुराण, गीता प्रेस, गोरखपुर।
