आर्यभट की जीवनी और विज्ञान एवं गणित में उनका योगदान 
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आर्यभट की जीवनी और विज्ञान एवं गणित में उनका योगदान 

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Shreyash Katiyar

Dec 15, 2025

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आर्यभट की जीवनी और विज्ञान एवं गणित में उनका योगदान 

भारतीय इतिहास में वैज्ञानिक सोच और गणित की गहराई उस समय से मौजूद है जब विश्व के कई हिस्से तब मिथकों में उलझे हुए थे। इस बौद्धिक विरासत का एक चमकता सितारा हैं – आर्यभट। वे सिर्फ एक गणितज्ञ या खगोलशास्त्री नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे विचारक थे जिन्होंने तर्क, अनुभव और गणना के ज़रिए सैकड़ों साल पहले ऐसी सच्चाइयाँ खोज निकालीं, जिनके बारे में तब कोई सोच भी नहीं सकता था। 

आर्यभट का जन्म और जीवन की शुरुआत

आर्यभट का जन्म वर्ष 476 ईस्वी में हुआ था। अब तक इतिहासकारों के बीच इस बात को लेकर मतभेद है कि वे कहां पैदा हुए थे। कई इतिहासकारों का मानना है कि उनका जन्म कुसुमपुर में हुआ था, जो कि वर्तमान में बिहार की राजधानी पटना के आसपास का क्षेत्र है। कुछ अन्य विद्वान यह दावा करते हैं कि वे केरल या अशमक जनपद (मध्य भारत) से थे, लेकिन सबसे अधिक स्वीकार्य मत यही है कि वे बिहार से थे।

हालांकि उनके शिक्षास्थान और कर्मस्थान को लेकर कोई मतभेद नहीं है। उन्होंने पाटलिपुत्र के प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की थी। नालंदा उस समय शिक्षा का अंतरराष्ट्रीय केंद्र था, जहां देश-विदेश से छात्र अध्ययन करने आते थे।

उन्होंने वहाँ शिक्षा प्राप्त की, और बाद में वहीं पर गणित और खगोलशास्त्र के अध्यापक भी बन गए। 

आर्यभट लिखित ग्रन्थ : विज्ञान और गणित के क्षेत्र में उनका योगदान 

आर्यभट ने वैसे तो कई ग्रन्थ लिखे थे लेकिन “आर्यसिद्धांता” - जैसे उनके कई ग्रन्थ खो गए या नष्ट हो गए। और सिर्फ “आर्यभटीय” पुस्तक ही अभी तक हमारे पास उपलब्ध है। 

“आर्यभटीय”। यह ग्रंथ उन्होंने मात्र 23 वर्ष की उम्र में लिखा था। यह इस बात का प्रमाण है कि वे एक असाधारण बुद्धिजीवी थे।

“आर्यभटीय” कुल 121 श्लोकों का ग्रंथ है, जो संस्कृत में लिखा गया है और इसमें न केवल गणितीय सिद्धांत, बल्कि खगोलशास्त्र, समयमापन, ग्रहों की गति और धरती की प्रकृति जैसी चीज़ों का भी उल्लेख मिलता है।

इस ग्रंथ को चार भागों में बाँटा गया है:

  1. गीतिकापाद – खगोल और समयमापन से जुड़ी बातें

  2. गणितपाद – अंकगणित, त्रिकोणमिति, बीजगणित आदि

  3. कालक्रियापाद – समय की गणना, युग, दिन-रात, ग्रहों की स्थिति

  4. गोलपाद – ग्रहों की गति और पृथ्वी से संबंधित ज्योतिषीय गणनाएँ

आर्यभट की वैज्ञानिक और गणितीय खोजें

1. शून्य की अवधारणा और दशमलव पद्धति

आर्यभट ने स्पष्ट रूप से दशमलव प्रणाली (Decimal System) का उपयोग किया, जिसमें संख्याओं का स्थान मान (Place Value) होता है। हालांकि उन्होंने शून्य को प्रतीक रूप में नहीं लिखा (जैसे '०'), लेकिन उन्होंने शून्य की भूमिका को गणना में पूर्णरूपेण समझाया और प्रयोग किया। 

और इस बात को फ्रेंच गणितज्ञ जॉर्ज्स इफ्राह ने भी माना है कि आर्यभट के स्थान मान (place value) system में जीरो निहित था। 

आर्यभट के कार्य को बाद में ब्रह्मगुप्त और अन्य भारतीय गणितज्ञों द्वारा आगे बढ़ाया गया। 

2. π (पाई) का सन्निकट मान

आज हम π = 3.1416 के रूप में जानते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आर्यभट ने यह मान 5वीं शताब्दी में ही निकाल लिया था?

उनका सूत्र था:

"चतुरधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम्।
अयुतद्वयविष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाहः।"

इसका अर्थ हुआ कि यदि 100 में 4 जोड़ें, उसे 8 से गुणा करें और फिर 62,000 में जोड़ें, तो 62,832 आता है। यदि किसी वृत्त का व्यास 20,000 हो, तो परिमाप (परिधि) 62,832 होगा। इस तरह π = 3.1416 निकला, जो आज के मान के बेहद करीब है।

3. पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना 

आर्यभट ने उस समय एक अत्यंत क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत किया था — पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। उन्होंने यह भी बताया कि सूर्य के उदय और अस्त होने का कारण पृथ्वी की यह गति है, न कि सूर्य का पृथ्वी के चारों ओर घूमना।

उस समय अधिकतर लोग यह मानते थे कि पृथ्वी स्थिर है और सभी आकाशीय पिंड उसके चारों ओर घूमते हैं। ऐसे समय में आर्यभट का यह कथन एक वैज्ञानिक क्रांति जैसा था।

4. ग्रहण की वैज्ञानिक व्याख्या

भारतीय पौराणिक ग्रंथों में सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण को "राहु" और "केतु" जैसे दैत्य ग्रहों की कथा से जोड़ा गया था। पर आर्यभट ने इसे तार्किक ढंग से समझाया।

उन्होंने बताया कि:

  • सूर्यग्रहण तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच आकर सूर्य की रोशनी को ढँक लेता है।

  • चंद्रग्रहण तब होता है जब पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के बीच आकर चंद्रमा पर अपनी छाया डालती है।

इस तरह आर्यभट ने ग्रहणों की भौतिक व्याख्या की जो आधुनिक विज्ञान से मेल खाती है।

5. त्रिकोणमिति (Trigonometry) का विकास

उन्होंने ज्या (sine), कोज्या (cosine), और उत्क्रमज्या (inverse sine) जैसी संकल्पनाओं का परिचय दिया। ये शब्द उस समय प्रचलित संस्कृत शब्दावली में थे, जो बाद में अरबी और लैटिन में बदलते हुए ‘sine’, ‘cosine’ आदि बने।

आर्यभट ने विभिन्न कोणों पर ‘ज्या’ के मानों की एक सारणी (table) भी तैयार की थी, जो उस समय एक अत्यंत उन्नत गणनात्मक उपकरण माना जा सकता है।

6. वर्ष की अवधि की सटीक गणना

आर्यभट ने एक वर्ष की अवधि को 365 दिन, 6 घंटे, 12 मिनट और 30 सेकंड बताया था, जो कि आज के सटीक मान 365.2422 दिन के बेहद करीब है।

यह अविश्वसनीय है कि उन्होंने बिना आधुनिक उपकरणों के आकाश की गहन गणनाएँ कर ली थीं।

आर्यभट का विश्व में प्रभाव

आर्यभट के कार्य सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहे। उनके ग्रंथों का अरबी और फारसी में अनुवाद हुआ। इस्लामी स्वर्णयुग में अल-ख्वारिज़्मी और अल-बिरूनी जैसे विद्वानों ने उनके कार्यों का अध्ययन किया।

आर्यभट के सिद्धांतों ने बाद में यूरोप के पुनर्जागरण काल में कोपरनिकस और गैलीलियो जैसे वैज्ञानिकों के विचारों को भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया।

भारत सरकार ने भी उनकी स्मृति में 1975 में देश का पहला उपग्रह "आर्यभट" नाम से लॉन्च किया। यह केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि अपने वैज्ञानिक अतीत के प्रति सम्मान का प्रतीक था।

निष्कर्ष: क्यों आज भी आर्यभट प्रासंगिक हैं?

आर्यभट जी की सबसे बड़ा गुण था – प्रश्न पूछना और परंपरा से अलग सोचना। जब पूरी दुनिया ब्रह्मांड को देवी-देवताओं के माध्यम से समझ रही थी, तब आर्यभट ने तार्किक गणना के ज़रिए ब्रह्मांड को समझने का प्रयास किया। 

जब वेस्टर्न वर्ल्ड में Pie, Earth rotation, Decimal system, aur Astronomy जैसे विषय के बारे में कोई जानता तक नहीं था, तब आर्यभट इनपर गहन अध्ययन कर चुके थे। 

भारत और विश्व के इतिहास में उन्हें हमेशा उनके इन वैज्ञानिक और गणित संबंधी शोधों के लिए जाना जाएगा। 

Academic world में भारतवर्ष को इतना सम्मान दिलाने के लिए हम हमेशा उनके कृतज्ञ रहेंगे। 

इतना समय देकर पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद। 

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